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Monday, July 4, 2022
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उनका हमारे बीच नहीं होकर होना ही उनकी महानता है

दिलीप बीदावत

जयपुर में किसी एक बैठक केे सिलसिले में, मैं जिस शख्स के साथ बीकानेर से रात्रि बस में गया था, वह कोई आम इंसान नहीं था लेकिन एक खास इंसान इतना सरल जीवन जीता है, यह जानकर मुझे बड़ी सीख मिली। हम दोनों प्रातः पांच बजे जयपुर पहुंच गए। दस बजे बैठक में भाग लेना था। रात्रि में ठीक से सो नहीं पाए थे। बड़ी शख्सियत साथ थी, तो चिंता के बजाय सुविधा की उधेड़-बुन मन चल रही थी। मन ही मन सोच रहा था कि किसी अच्छे होटल में आराम करेंगे लेकिन वह सीधे जयपुर केे रामा होटल पहुंच गए, जहां बीकानेर केे अधिकांश लोग रुकते हैं। जयपुर का सबसे सस्ता गरीबों का होटल। मन में फिर विचार आया कि चलो रूम तो मिलेगा। हमें तो चार घंटे बिताने हैं लेकिन उन्होंने रिसिप्शन पर बैठे व्यक्ति से कहा, ‘‘दो अलमारी व दो खाट दे दो।’’ पैंतीस रुपए एक खाट और अलमारी के चार्ज किए। फिर मेरी तरफ मुखातिब हो बोले, ’’थोड़ी देर आराम कर लो, यहां काॅमन लेट-बाथ हैं, फ्रेस होकर बैठक में चलेंगे।’’ 

ठीक नौ बजे होटल से बाहर निकले। पौहे की थड़ियां लग चुकी थी। लोग नाश्ता कर रहे थे। मैं उनके पीछे चल रहा था। थड़ी केे पास पहुंच कर बोले, ’’नाश्ता कर लेते हैं। बहुत स्वादिष्ट पौहे बनाते हैं। तेल, मसाला नहीं है। नाश्ता किया। पोलोविक्ट्री सिनेमा से झालाना की सीटी बस पकड़ी और पहुंच गए ओफिसर ट्रेनिंग सेंटर सभागार में। यह शख्स ओर कोई नहीं, उरमूल परिवार के मुखिया अरविंद ओझा ही थे। वे अपने परिवार की टीम से जुड़े साथियों को उपदेशों और भाषणों से नहीं, अपने जीवन के व्यवहार से ज्यादा सिखाते थे। वो हमेशा कहते थे कि उरमूल में सरकारी, गैर सरकारी संगठनों के माध्यम से जो भी आर्थिक संसाधन आता हैं, वह समुदाय के लिए है। हम हमारी जरूरतों को सीमित रखने का प्रयास करें। गरीबों की तरह जीना सीखें।

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                                             उनका हमारे बीच नहीं होकर होना ही उनकी महानता है

आमने-सामने मेरी उनसे अंतिम मुलाकात 25 फरवरी, 2020 को जायल के झाड़ेली गांव में उरमूल खेजड़ी संस्थान में हुई। उन्नति विकास शिक्षण संगठन व उरमूल खेजड़ी जायल ब्लाॅक में शामलात शोध यात्रा की तैयारी थी, जिसके तहत पारंपरिक जल स्रोतों, चारागाहों का समुदाय द्वारा विकास एवं प्रबंधन की व्यवस्था कोे समझना था। चालीस गांवों के लिए प्रस्तावित इस यात्रा में संलग्न होने वाली टीम को सहभागी रिसर्च के तरीकों पर प्रशिक्षण देने, टीम में ऊर्जा का संचार करने एवं यात्रा को हरी झंडी दिखा कर रवाना करने के लिए अरविंद जी को आमंत्रित किया था। दो दिन हमारे साथ रहे। यात्रा का शुभारंभ कराने के बाद हम उनसे अलग होे गए। 5 मार्च तक यात्रा पूर्ण की। अगला नियोजन बाड़मेर जिले के सिणधरी क्षेत्र का था। भारत के कुछ राज्यों में कोरोना वायर की झिंणी‘-झिंणी खबरें आने लग गई थीं। दोनों क्षेत्रों की शामलात शोध यात्रा के बाद पोकरण में वाटर लीडर्स सम्मेलन प्रस्तावित था, जहां एक बार अरविंद जी से मुलाकात का मौका मिलता लेकिन लाॅकडाउन के बाद से आज तक स्थितियां सामान्य नहीं होने के कारण सोचा-समझा सारा धरा-धराया रह गया।  

उरमूल परिवार के साथ अरविंद ओझा का एक औपचारिक जुड़ाव कह सकते हैं, लेकिन उनकी पहचान देश के उन प्रतिष्ठित व्यक्तियों, संस्थानों में होती है, जो शोषित, वंचित दबे-कुचले लोगों के सर्वांगिण विकास का प्रतनिधित्व करते हैं। वे राजस्थान सहित देश के कई संगठनों, संस्थानों केे साथ जुड़े हुए थे, उनका मार्गदर्शन एवं सहयोग करते थे। ग्रामीण विकास की नपीतुली समझ रखने और पैरवरी करने वाली महान शख्सियतों में ग्रामीण विकास विज्ञान समिति के लक्ष्मी चंद त्यागी, श्यौर संस्थान के मघराज जैन, आस्था, उदयपुर के ओम श्रीवास्ताव लोक जुंबिश एवं दूसरा दशक के जनक अनिल बोर्दिया के साथ की कड़ी में अरविंद ओझा का नाम आता था। अपनी जीवन का साठ से सत्तर फिसदी हिस्सा उन्होंने यात्राओं में व्यतीत किया। पश्चिमी रेगिस्तान के किसी कौने के छोटे से सीमांत गांव से लेकर राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर विकास के मुद्दों की पैरवी में उनकी उपस्थिति उनकी सक्रियता की परिचायक है। विचारक, लेखक, कवि के रूप में उनकी कृतियां उनकी याद के साथ मौजूद है। राजस्थान पत्रिका में गांव चैपाल स्थाई स्तंभ में उन्होंने गांव के मुद्दों को उजागर किया। उरमूल के मुखपत्र ‘‘काल का सच’’ का संपादन कर लंबे समय तक आम समुदाय की आवाज को व्यवस्था के कानों तक पहुंचाया।  

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                              उनका हमारे बीच नहीं होकर होना ही उनकी महानता है

भले ही वैचारिक मतभेद अथवा हितों की टकराहट के कारण कोई व्यक्ति या वर्ग माने-नहीं माने,  पश्चिमी राजस्थान में महिलाओं, किशोंरियों, गरीब किसानों का सशक्तिकरण उनके काम की जीती जागती मिशाल है। जब नहरी क्षेत्र में दूर-दराज तक प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था नहीं थी, शिक्षाकर्मी और लोक जुंबिश जैसे आंदोलन, शिक्षा से वंचित बालिकाओं के आवासीय शिविर जैसी व्यवसाएं कर लाखों छात्र-छात्राओं को शिक्षा से जोड़ा, जो आज कहीं न कहीं उस सहयोग को याद कर रहे होंगे। दूर-दराज के क्षेत्रों में महिला एवं बाल विकास की सेवाएं कुपोषित महिलाओं, बच्चों और बालिकाओं तक कैसे पहुंचे, उसके लिए पूरे ब्लाॅक में विभाग की गतिविधियों का संचालन कर उदाहरण पेश किया। पाक विस्थापित समुदायों की महिलाओं केे कसीदे के हुनर को आजीविका में बदलने की मुहीम के कारण इस कला को पहचान मिली। नहर आने से यहां के लोगों, खेती, पशुपालन, पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ा है, सरकारी नीतियों में किस प्रकार केे बादलाव की जरूरत है, नहर यात्रा की सीख को सरकार के साथ साझा करने का काम हो या 1994 में बाड़मेर मलेरिया का प्रकोप, सभी जगहों पर उरमूल की उपस्थिति किसी सफल नेतृत्व केे बिना संभव नहीं है, जिसको अरविंद ओझा ने बरकरार रखा। विकास की धरातल से लेकर क्षितिज तक अनुभव व समझ रखने के कारण ही सरकारी नीतियों का निर्माण, बदलाव, योजनाओं केे कियान्वयन की प्रक्रिया मानव संसाधनों का विकास, प्रशिक्षण, गैर सरकारी संगठनों का मार्गदर्शन की आवश्यकता महससू होने पर उनको आमंत्रित किया जाता था। उनकी तीस साल की इस विकास यात्रा के योगदान को शब्दों में अभिव्यक्त करना मुश्किल है, लेकिन लाखों दिलों में यह लौ जलती हुई दिखाई दे रही है।    

संजय घोष ने उरमूल स्वास्थ्य शोध एवं विकास ट्रस्ट नामक जिस पौधे कोे पश्चिमी रेगिस्तान की धरा पर रोपा था, उस पौधे को सींचने और एक वट वृक्ष के रूप में विकसित करने वाले जिन लोगों ने अपना योगदान दिया, उनमें से एक महत्वपूर्ण नाम अरविंद ओझा का है। रंगकर्मी कैलाश भारद्वाज, गंगा गुप्ता, चैतनाराम चौधरी, सही राम चौधरी, धन्नाराम नायक, रमेश सारण, रामपाल विश्नोई, लाल जी थानवी उरमूल परिवार से करीबी साथी रहे हैं, तो उरमूल के बाहर रमेश थानवी, ओम थानवी, कविता श्रीवास्तव, अरुणा राॅय, निखिल डे, बिनोय आचार्य, सत्येन चतुर्वेदी, दीप चंद सांखला जैसेे दिग्गज और जुझारू व्यक्तित्व सरीखे हजारों लोग वैचारिक समानता के सखा रहे हैं। गरीबों की आवाज और उनके जीवन से जुड़े मुद्दों को विनम्रता से वजनदार आवाज में सरकार, गैर सरकारी संगठनों, राजनैतिक व सामाजिक मंचों पर पैरवी कर बदलाव की बयार को रफ्तार देने वाले अरविंद ओझा का हमारे बीच नहीं रहना जहां एक अपार क्षति का अहसास कराएगा, वहीं उनके सामाजिक, आर्थिक बदलावों की सीख, उनके प्रगतिशील विचार हमें सदैव ऊर्जा देते रहेंगे। सामाजिक रीति से निर्मित परिवार के अतिरिक्त उनका एक लंबा- चौड़ा परिवार है। उनके मार्गदर्शन, विचारों, जीवन के मिशन, आदर्शों को विनम्र कठोरता केे साथ आगे बढ़ाते रहेंगे, यही उनको सच्ची श्रृद्धांजलि होगी। (लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं)

 

बाबूलाल नागा
बाबूलाल नागाhttps://bharatupdate.com
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