Home देश- दुनिया मजदूर को उनके वे सभी संवैधानिक हक मिलें जिनका उन्हें अधिकार है

मजदूर को उनके वे सभी संवैधानिक हक मिलें जिनका उन्हें अधिकार है

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हर साल  अंतरराष्ट्रीय  मजदूर दिवस मई महीने की पहली तारीख को मनाया जाता है।   अंतरराष्ट्रीय   मजदूर दिवस को ‘‘मई दिवस’’ भी कहा जाता है।  अंतरराष्ट्रीय  मजदूर दिवस की शुरुआत एक मई 1886 को अमेरिका में हुए एक आंदोलन से हुई थी। इस दिन मजदूर लोग रोजाना 15-15 घंटे काम कराए जाने और शोषण के खिलाफ पूरे अमेरिका में सड़कों पर उतर आए थे। इसके बाद 1889 में   अंतरराष्ट्रीय   समाजवादी सम्मेलन की दूसरी बैठक में एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें यह ऐलान किया गया कि 1 मई को   अंतरराष्ट्रीय  मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाएगा और इस दिन सभी कामगारों और श्रमिकों का अवकाश रहेगा। इसी के साथ भारत सहित दुनिया के तमाम देशों में काम के लिए पहली बार 8 घंटे काम का अधिकार हासिल हुआ था।
मजदूरों के इस ऐतिहासिक आंदोलन को 136 वर्ष हो गए है। पर मजदूरों के हालातों में बदलाव दिखाई नहीं देता। देश के कई हिस्सों में 8 घंटे काम के साथ मजदूरों की अन्य मांगों को लेकर संघर्ष 2022 में भी जारी है। बाजारवाद के दौर में कारपोरेट घरानों के इशारों पर चलने वाली सरकारें मजदूर एवं उनके आंदोलन को कुचलने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपना रही है। सरकारें मजदूरों को कानूनी अधिकार से वंचित कर कारपोरेट सेक्टर को फायदा पहुंचाने के लिए कानून में बदलाव कर रही है।
कहने को तो  अंतरराष्ट्रीय  स्तर पर ‘‘मजदूर दिवस ’’ के दिन केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा मजदूरों के कल्याणार्थ अनेक योजनाएं शुरू की जाती हैं पर आजादी के 75 साल बाद भी ये सारी योजनाएं गरीब मजदूर को एक वक्त पेट भर रोटी नहीं दे सकी। आज इस कंप्यूटर युग ने मशीनों की रफ्तार तो तेज कर दी परंतु कल कारखानों और औद्योगिक इकाइयों की रौनक छीन ली। मजदूरों से भरी रहने वाली ये मिलें, कारखाने कंप्यूटरीकृत होने से एक ओर जहां मजदूर बेरोजगार हो गया, वही ये इकाइयां बेरौनक हो गईं। मजदूर आज भी मजदूर है, चाहे कल उसने ताज महल बनाया हो,  ताज होटल बनाया हो या फिर संसद भवन, उसे आज भी सुबह उठने पर सबसे पहले अपने बच्चों के लिए शाम की रोटी की फिक्र होती है। हमारे देश का मजदूर वर्ग आज भी अत्यंत ही दयनीय स्थिति में रह रहा है। उनको न तो मालिकों द्वारा किए गए कार्य की पूरी मजदूरी दी जाती है और ना ही अन्य वांछित सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाती है। गांव में खेती के प्रति लोगों का रुझान कम हो रहा है। इस कारण बड़ी संख्या में लोग मजदूरी करने के लिए शहरों की तरफ पलायन कर जाते हैं। जहां ना उनके रहने की कोई सही व्यवस्था होती है ही उनको कोई ढंग का काम मिल पाता है। मगर आर्थिक विपन्नता के चलते शहरों में रहने वाले मजदूर वर्ग जैसे तैसे कर वहां अपना गुजर-बसर करते हैं।
कहने को तो हम पूरी दुनिया में एक मई को मजदूर दिवस के रूप में मनाते हैं लेकिन अफसोस इस बात का भी है कि आज ज्यादातर श्रमिक अपने इस खास दिन के महत्व और इतिहास के बारे में नहीं जानते। आज भारत में 90 प्रतिशत से ज्यादा मजदूरों को यह तक नहीं मालूम कि मजदूर दिवस होता क्या है और इसे क्यों मनाया जाता है। उन्हें तो दो वक्त की रोटी जुटाने के आगे फुर्सत ही कहां हैं कि वह समझ सकें कि मजदूर दिवस है क्या? भारत देश में मजदूरों की मजदूरी के बारे में बात की जाए तो यह भी एक बहुत बड़ी समस्या है। आज भी देश में कम मजदूरी पर मजदूरों से काम कराया जाता है। यह भी मजदूरों का एक प्रकार से शोषण है। आज भी मजदूरों से फैक्टरियों या प्राइवेट कंपनियों द्वारा पूरा काम लिया जाता है लेकिन उन्हें मजदूरी के नाम पर बहुत कम मजदूरी पकड़ा दी जाती है जिससे मजदूरों को अपने परिवार का खर्चा चलाना मुश्किल हो जाता है। पैसों के अभाव से मजदूर के बच्चों को शिक्षा से वंचित रहना पड़ता है। कारखानों में काम करने वाले  मजदूरों  पर हर वक्त इस बात की तलवार लटकती रहती है कि ना जाने कब मील मालिक उनकी छटनी कर काम से हटा दे। कारखानों में कार्यरत मजदूरों से निर्धारित समय से अधिक काम लिया जाता है। विरोध करने पर काम से हटाने की धमकी दी जाती है। मजबूरी में मजदूर कारखाने के मालिक की शर्तों पर काम करने को मजबूर होता है।  कारखानों   में श्रम विभाग के मापदंडों के अनुसार किसी भी तरह की कोई सुविधाएं नहीं दी जाती है। बेशक, इसको लेकर देश में विभिन्न राज्य सरकारों ने न्यूनतम मजदूरी के नियम लागू किए हैं, लेकिन इन नियमों का खुलेआम उल्लंघन होता है और इस दिशा में सरकारों द्वारा भी कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता और न ही कोई कार्रवाई की जाती है।
बहरहाल, जरूरी है कि देश के हर मजदूर को उनके वे सभी संवैधानिक हक मिलें  जिनका उन्हें  अधिकार है। आज मजदूर काम का अधिकार, पूरी मजदूरी का अधिकार मांग रहा है। मजदूर शोषण से मुक्ति चाहता है। यदि यूंहि मजदूरों के संवैधानिक हकों का हनन होता रहेगा और उनके सामाजिक उत्थान पर भी ध्यान नहीं दिया जाएगा तो हर वर्ष 1 मई का ये मजदूर दिवस हमारे सामने ऐसे ही कई सवाल छोड़ कर अगले वर्ष की ओर बढ़ जाएगा। (लेखक भारत अपडेट के संपादक हैं) (संपर्क-9829165513)

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