3.4 C
New York
Friday, March 20, 2026
Homeग्रामीण भारतरोजगार तलाशते असंगठित क्षेत्रों के मजदूरों का भविष्य

रोजगार तलाशते असंगठित क्षेत्रों के मजदूरों का भविष्य

-संगीता कुमारी मुजफ्फरपुर, बिहार

भारत की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के कंधों पर टिका हुआ है, लेकिन फिर भी यही वर्ग सबसे अधिक उपेक्षित और असुरक्षित बना हुआ है। अस्थिरता, असमानता और काम के लिए रोज का संघर्ष इनके जीवन की वास्तविकता है। प्रतिदिन काम का न मिलना, मिल भी जाए तो कम मजदूरी, और सामाजिक सुरक्षा के अभाव ने उनके जीवन को लगातार संकट में डाल रखा है। यह केवल आर्थिक समस्या नहीं है, बल्कि यह उनके अस्तित्व, सम्मान और परिवारिक संरचना को भी प्रभावित करती है। कोरोना महामारी के बाद से असंगठित क्षेत्रों के मजदूरों की स्थिति और भी अधिक चिंताजनक हो गई है। उन्हें कई स्तरों पर भेदभाव और असमानता का शिकार होना पड़ता है।

इसका सबसे अधिक प्रभाव महिलाओं पर पड़ता है। असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाएं पुरुषों की तुलना में न केवल कम मजदूरी पाती हैं, बल्कि कई बार उनसे पुरुषों के बराबर काम लेकर भी कम भुगतान किया जाता है। इसके साथ ही उन्हें घर की जिम्मेदारियों का भी पूरा बोझ उठाना पड़ता है। यह दोहरी जिम्मेदारी उनके जीवन को और कठिन बना देती है। महिलाओं के श्रम को अक्सर ‘सहायक’ या ‘पूरक’ माना जाता है, जबकि वास्तव में वे परिवार की आर्थिक रीढ़ होती हैं। जबकि इस नजरिए को पूरी तरह से बदलने की आवश्यकता है, ताकि उनके योगदान को भी सही पहचान और सम्मान मिल सके।

कई आँकड़े और रिपोर्ट बताते हैं कि अन्य राज्यों की तुलना में झारखंड और बिहार से सबसे अधिक लोग मजदूरी के लिए अन्य राज्यों की ओर पलायन करते हैं। बिहार में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की संख्या करोड़ों में है, और मुजफ्फरपुर जिले में भी लाखों लोग इसी वर्ग में आते हैं। न्यूनतम मजदूरी की बात करें तो सरकार द्वारा तय मजदूरी अक्सर कागजों तक सीमित रह जाती है। वास्तविकता में मजदूरों को इससे काफी कम भुगतान किया जाता है, जो उनके श्रम का उचित मूल्य नहीं है। उनसे न्यूनतम मजदूरी में अधिकतम काम कराया जाता है। मुजफ्फरपुर के अधिकांश मजदूर कृषि, निर्माण कार्य, ईंट-भट्ठों और छोटे-मोटे दिहाड़ी कार्यों पर निर्भर हैं। लेकिन इन क्षेत्रों में रोजगार नियमित नहीं होता। वर्ष के कुछ महीनों में ही काम मिल पाता है, जबकि बाकी समय वे बेरोजगारी की मार झेलते हैं।

गरीबी और बेरोजगारी की यह स्थिति उन्हें अपने घर-परिवार से दूर जाने के लिए मजबूर करती है। बेहतर रोजगार की तलाश में वे पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में पलायन करते हैं। यह पलायन केवल आर्थिक मजबूरी नहीं, बल्कि पारिवारिक संकट भी है। अपने परिवार, बच्चों और गांव को छोड़कर अनजान शहरों में रहना, असुरक्षित परिस्थितियों में काम करना, और कई बार शोषण का शिकार होना उनके जीवन का हिस्सा बन जाता है। पीछे छूटे परिवार, विशेषकर महिलाएं और बच्चे, असुरक्षा और अभाव में जीवन जीते हैं।

हालांकि केंद्र से लेकर राज्य सरकार तक मजदूरों के हित में कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, जैसे मनरेगा (नया नाम – विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण), प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजना, और बिहार राज्य की विभिन्न सामाजिक सुरक्षा योजनाएं शामिल हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य मजदूरों को रोजगार, पेंशन और अन्य सुविधाएं प्रदान करना है। लेकिन जमीनी स्तर पर इन योजनाओं का लाभ ज्यादातर असंगठित क्षेत्रों के इन मजदूरों तक नहीं पहुंच पाता है। जानकारी की कमी, भ्रष्टाचार, जटिल प्रक्रियाएं और स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक उदासीनता इसके प्रमुख कारण हैं। कई मजदूरों के पास जरूरी दस्तावेज तक नहीं होते हैं, जिससे वे इन योजनाओं से वंचित रह जाते हैं।

2026-27 के केंद्रीय बजट में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए कुछ प्रावधान किए गए हैं। जिनमें रोजगार सृजन, कौशल विकास और सामाजिक सुरक्षा को बढ़ावा देने की बात की गई है। डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से मजदूरों को पंजीकृत करने और उन्हें सीधे लाभ पहुंचाने की योजनाएं भी शामिल हैं। हालांकि, इन योजनाओं की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इन्हें कितनी प्रभावी तरीके से लागू किया जाता है। क्योंकि केवल घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि उनके क्रियान्वयन में पारदर्शिता और जवाबदेही सबसे ज्यादा जरूरी होती है।

असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की स्थिति को सुधारने के लिए केवल आर्थिक उपाय ही नहीं, बल्कि सामाजिक और नीतिगत बदलाव भी जरूरी हैं। उन्हें सम्मानजनक मजदूरी, सुरक्षित कार्य वातावरण और पेंशन जैसी सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना आवश्यक है। साथ ही, महिलाओं के श्रम को समान मान्यता और अवसर देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जब तक समाज और सरकार मिलकर इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाएंगे, तब तक यह वर्ग संघर्ष और असमानता के चक्र में फंसा रहेगा।

मनरेगा के स्थान पर बने ‘वीबी जी राम जी’ में सरकार ने इन क्षेत्रों के मजदूरों के हितों का ख्याल रखने का प्रयास तो किया है, लेकिन यह जमीन पर कितना हकीकत बनेगा, यह आने वाला समय ही बताएगा। फिलहाल यह समय है कि हम इन मजदूरों की आवाज़ और इनके दर्द को सुनें और उनके जीवन को बेहतर बनाने के लिए ठोस प्रयास करें। क्योंकि यह समाज के सबसे कमजोर वर्गों में गिने जाते हैं और जब तक समाज का यह कमजोर वर्ग सशक्त नहीं होगा, तब तक वास्तविक विकास की परिभाषा का साकार होना संभव नहीं है।
(यह लेखिका के निजी विचार हैं)

Bharat Update
Bharat Update
भारत अपडेट डॉट कॉम एक हिंदी स्वतंत्र पोर्टल है, जिसे शुरू करने के पीछे हमारा यही मक़सद है कि हम प्रिंट मीडिया की विश्वसनीयता इस डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी परोस सकें। हम कोई बड़े मीडिया घराने नहीं हैं बल्कि हम तो सीमित संसाधनों के साथ पत्रकारिता करने वाले हैं। कौन नहीं जानता कि सत्य और मौलिकता संसाधनों की मोहताज नहीं होती। हमारी भी यही ताक़त है। हमारे पास ग्राउंड रिपोर्ट्स हैं, हमारे पास सत्य है, हमारे पास वो पत्रकारिता है, जो इसे ओरों से विशिष्ट बनाने का माद्दा रखती है।
RELATED ARTICLES

Most Popular

Recent Comments