
— बाबूलाल नागा
चित्तौड़गढ़ जिले के मेवदा कॉलोनी की एक दर्दनाक घटना ने देश के लोकतांत्रिक ढांचे पर फिर से सवाल खड़ा कर दिया है—क्या भारत में अब भी कानून का राज है, या भीड़ ही न्याय तय करने लगी है?
31 मार्च की रात सत्तु कंजर और उसके तीन साथी घर से निकले थे। इसके बाद जो हुआ, वह किसी सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है। ग्रामीणों की एक भीड़ ने उन्हें पकड़ लिया, बंधक बनाया और मंदिर के पास बेरहमी से पीटा। यह कोई आकस्मिक हिंसा नहीं थी, बल्कि एक संगठित और निर्मम हमला था, जिसका अंत 1 अप्रैल को उदयपुर के महाराणा भूपाल चिकित्सालय में सत्तु की मौत के रूप में हुआ।
उसके पिता जगदीश गंभीर रूप से घायल हैं और जिंदगी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस गंभीर घटना के बावजूद अब तक कोई ठोस गिरफ्तारी नहीं हुई। और उससे भी अधिक हैरान करने वाली बात—एफआईआर में सत्तु की मौत का उल्लेख तक नहीं। यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि न्याय प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सीधा सवाल है।
सत्तु कंजर की हत्या सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं है, बल्कि संविधान द्वारा दिए गए मूल अधिकारों—जीवन, समानता और गरिमा—का खुला उल्लंघन है। जब भीड़ खुद को अदालत, पुलिस और जल्लाद मानने लगे, तो यह लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक संकेत है।
कंजर समुदाय, जो पहले से ही सामाजिक हाशिए पर है, बार-बार ऐसी हिंसा का शिकार हो रहा है। मेवदा कॉलोनी में पहले भी भीड़ द्वारा हत्या की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। यह बताता है कि यह केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि गहरे सामाजिक भेदभाव और संगठित हिंसा का मामला है।
देशभर में भीड़ हिंसा की घटनाएं पिछले कुछ वर्षों में बढ़ी हैं। चाहे वह चोरी के शक में हत्या हो, जातिगत हिंसा हो या अफवाहों के आधार पर हमला—हर बार भीड़ कानून को अपने हाथ में लेती नजर आती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या ऐसे मामलों में हमारी न्याय व्यवस्था उतनी ही तेजी और सख्ती से काम कर रही है, जितनी अपेक्षित है?
इस पूरे मामले में प्रशासन की भूमिका भी कठघरे में है। यदि समय रहते हस्तक्षेप होता, तो शायद एक जान बचाई जा सकती थी। अब भी यदि दोषियों की शीघ्र गिरफ्तारी और सख्त सजा नहीं होती, तो यह एक खतरनाक संदेश देगा—कि भीड़ हिंसा करने वालों को कानून का कोई भय नहीं है।
समाधान केवल निंदा में नहीं, कार्रवाई में है। भीड़ हिंसा के खिलाफ सख्त कानून, पुलिस की जवाबदेही तय करना, और समाज में जागरूकता बढ़ाना—ये तीनों कदम अब अनिवार्य हो चुके हैं।
सत्तु कंजर की मौत हमें एक असहज सवाल के सामने खड़ा करती है—क्या हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं, जहां इंसाफ अदालतों में नहीं, बल्कि भीड़ के हाथों तय होगा? अगर जवाब “नहीं” है, तो हमें अभी और यहीं यह तय करना होगा न्याय भीड़ नहीं, कानून करेगा। (लेखक भारत अपडेट के संपादक हैं)
