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Friday, March 20, 2026
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जाति जनगणना में अलग कॉलम की मांग करोड़ों घुमंतू लोगों की पहचान का सवाल है

पारस बंजारा

आगामी 2026-27 की जनगणना में डिनोटिफाइड, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियों (डीएनटी) की अलग से गणना सुनिश्चित करने के लिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की गई है। यह याचिका डायरी नंबर 15389/2026 के तहत दायर की गई है।

याचिका में सर्वोच्च न्यायालय से अनुरोध किया गया है कि वह भारत सरकार को निर्देश दे कि जनगणना की प्रश्नावली में डीएनटी समुदायों के लिए अलग श्रेणी या कॉलम शामिल किया जाए, ताकि इन समुदायों की वास्तविक संख्या और सामाजिक-आर्थिक स्थिति का सटीक आकलन हो सके।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि देश में बड़ी संख्या में डिनोटिफाइड, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदाय रहते हैं, लेकिन अब तक जनगणना में उनकी अलग पहचान दर्ज नहीं होने के कारण उनकी वास्तविक आबादी और स्थिति के बारे में स्पष्ट आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। इससे इन समुदायों के लिए योजनाएं बनाने और लक्षित कल्याणकारी कार्यक्रम लागू करने में कठिनाई आती है।

याचिका में यह भी मांग की गई है कि वर्ष 2026-27 की जनगणना के दौरान डीएनटी समुदायों की सही और व्यापक गणना सुनिश्चित की जाए। याचिका में सर्वोच्च न्यायालय से अनुरोध किया गया है कि वह केंद्र सरकार को निर्देश दे कि जनगणना प्रश्नावली में डीएनटी समुदायों के लिए अलग श्रेणी/कॉलम शामिल किया जाए। साथ ही एकत्रित आंकड़ों का उपयोग इन समुदायों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए नीति निर्माण और लक्षित कल्याणकारी योजनाओं के क्रियांवयन में किया जाए।

याचिकाकर्ताओं का मानना है कि यदि जनगणना में डीएनटी समुदायों की अलग से गणना की व्यवस्था होती है, तो इससे उनकी वास्तविक सामाजिक-आर्थिक स्थिति सामने आएगी और सरकार के लिए उनके लिए प्रभावी नीतियां बनाना आसान होगा। यह जनहित याचिका तीन सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा दायर की गई है। इनमें फिल्म निर्माता, रंगकर्मी और डीएनटी अधिकार कार्यकर्ता दक्षिणकुमार बजरंगी, बेडिया समुदाय के साथ काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता रोहिणी छारी, तथा डीएनटी समुदायों के साथ लंबे समय से काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता परश राम गरासिया शामिल हैं।

डीएनटी समुदायों की अलग गणना को लेकर कई सरकारी आयोग और संस्थाएं पहले ही सिफारिश कर चुकी हैं, जिनमें प्रमुख हैं: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (2000), डीएनटी पर तकनीकी सलाहकार समूह (2006), रेणके आयोग (2008), इदाते आयोग (2017) इन बार-बार की सिफारिशों के बावजूद अब तक जनगणना में डीएनटी समुदायों के लिए अलग श्रेणी शामिल नहीं की गई है।

डिनोटिफाइड, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियां वे समुदाय हैं जिन्हें औपनिवेशिक काल में 1871 के क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट के तहत “वंशानुगत अपराधी” घोषित कर दिया गया था। हालांकि यह कानून 1952 में समाप्त कर दिया गया, लेकिन इन समुदायों के प्रति सामाजिक कलंक और संरचनात्मक भेदभाव आज भी जारी है। अनुमान है कि भारत में 10 से 12 करोड़ लोग डीएनटी समुदायों से आते हैं, लेकिन स्वतंत्रता के बाद किसी भी जनगणना में उनकी अलग से गणना नहीं की गई। इन समुदायों की अंतिम बार व्यवस्थित गणना 1931 की जनगणना में दर्ज की गई थी।

डीएनटी समुदायों की अलग से गणना होना बहुत जरूरी है। क्योकि डीएनटी समुदायों की अलग से गणना नहीं होने के कारण कई गंभीर समस्याएं सामने आती हैं। इन समुदायों की वास्तविक आबादी का विश्वसनीय डेटा उपलब्ध नहीं है। सरकारी योजनाएं और नीतियां इन तक प्रभावी रूप से नहीं पहुंच पातीं। कई डीएनटी समुदाय अलग-अलग राज्यों में एससी, एसटी, ओबीसी या बिना किसी श्रेणी के असंगत तरीके से वर्गीकृत हैं। डीएनटी के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए सीड योजना जैसी कल्याणकारी योजनाओं के क्रियांवयन में पहचान और प्रमाणन की कमी के कारण समस्याएं उत्पन्न होती हैं।

यदि जनगणना में डीएनटी के लिए अलग कॉलम शामिल किया जाता है तो इन समुदायों की वास्तविक आबादी और सामाजिक-आर्थिक स्थिति का स्पष्ट आंकड़ा उपलब्ध होगा। लक्षित और प्रभावी कल्याणकारी नीतियां बनाई जा सकेंगी। शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और आजीविका से जुड़ी योजनाओं तक न्यायसंगत पहुंच सुनिश्चित होगी। समानता, गरिमा और सामाजिक न्याय के संवैधानिक अधिकारों को मजबूती मिलेगी।

जनगणना में डीएनटी समुदायों की अलग गणना केवल एक सांख्यिकीय प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह उन करोड़ों नागरिकों की पहचान, गरिमा और सामाजिक न्याय से जुड़ा मुद्दा है जो दशकों से सरकारी आंकड़ों में अदृश्य बने हुए हैं। यदि आगामी जनगणना में डिनोटिफाइड, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियों की अलग से गणना नहीं की गई, तो ये समुदाय आगे भी अदृश्य और न्याय से वंचित बने रहेंगे। जनगणना के माध्यम से सही पहचान मिलना भारत के करोड़ों डीएनटी लोगों के लिए गरिमा, अधिकार और समान विकास सुनिश्चित करने की दिशा में पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम है। (लेखक ओलखाण ट्रस्ट के निदेशक एवं डीएनटी राइट्स एक्शन ग्रुप से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता हैं)

 

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