
-अमरपाल सिंह वर्मा
मैं राजस्थान में हनुमानगढ़ जिले में अपने पैतृक कस्बे संगरिया में रहता हूं। पिछले कुछ सालों में मैंने यहां एक बदलाव महसूस किया है। पहले गलियों में खेलते बच्चों की आवाजों में बागड़ी, पंजाबी, सिंधी और हरियाणवी की अलग-अलग लय सुनाई देती थी।। घरों के आंगन में दादी-पोते की बातचीत स्थानीय बोलियों में होती थी। अब वही बच्चे अक्सर हिंदी में बात करते दिखते हैं। कई घरों में माता-पिता भी बच्चों से मातृभाषा के बजाय हिंदी में संवाद करना पसंद करने लगे हैं। कुछ परिवारों में तो अंग्रेजी भी संवाद का जरिया बन रहा है। यह सिर्फ भाषा बदलने की बात नहीं है बल्कि हमारी बदलती सोच का भी संकेत है।
लोग अपनी बोली इसलिए नहीं छोड़ रहे कि वह कठिन है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण ‘भविष्य’ का डर और उम्मीद दोनों हैं। असल कारण ‘भविष्य’ है। छोटे कस्बों का एक बड़ा वर्ग मानने लगा है कि हिंदी बोलने वाला बच्चा ज्यादा स्मार्ट, आत्म विश्वासी और आधुनिक दिखाई देता है। अंग्रेजी को सफलता की भाषा माना जा रहा है जबकि स्थानीय बोली को घर के बुजुर्गों की बोली समझा जाने लगा है। भाषा अब केवल संवाद का माध्यम नहीं रही है, वह सामाजिक दर्जे और छवि से भी जुड़ गई है। संगरिया जैसे कस्बों में यह बदलाव ज्यादा साफ इसलिए दिखता है क्योंकि यहां पुरानी और नई दुनिया साथ-साथ चल रही हैं। एक ओर पुराना ग्रामीण-सांस्कृतिक संसार है तो दूसरी ओर मोबाइल और इंटरनेट की तेज दुनिया। पहले बच्चे दादी से कहानियां सुनते थे, खेत-खलिहान से जुड़े शब्द सीखते थे, कहावतें याद करते थे। अब कई बच्चे यूट्यूब, इंस्टाग्राम और कार्टून चैनलों से भाषा सीख रहे हैं। उनकी बोली में अब स्थानीय लय कम और डिजिटल दुनिया की नकल ज्यादा दिखती है।
यह बात केवल बच्चों तक सीमित नहीं है। इस बारे में जब मैंने लोगों से बात की तो उनके मन के कई डर सामने आए। कई माता-पिता मानते हैं कि अगर बच्चा घर की बोली ज्यादा बोलेगा तो कहीं उसे ‘देहाती’ या कम आधुनिक न समझ लिया जाए। यही सोच धीरे-धीरे घरों की भाषा बदल रही है। कई परिवारों में मातृभाषा अब दादा-दादी तक सीमित रह गई है। नई पीढ़ी उसे सुनती तो है पर सहजता से बोल नहीं पाती। हमारे इधर संगरिया, हनुमानगढ़, गंगानगर और आसपास के इलाकों में इसका एक और पक्ष दिखाई देता है। विभाजन के समय पाकिस्तान से आए कई परिवार बहावलपुरी और सरायकी जैसी बोलियां बोलते थे। इन बोलियों में उनके विस्थापन की कहानियां, लोक गीत, रिश्तों की गर्माहट और जीवन की स्मृतियां बसी थीं। आज हालत यह है कि इन्हें बोलने वाले कुछ बुजुर्ग ही बचे हैं। नई पीढ़ी के लिए ये शब्द लगभग अनजाने हो चुके हैं। सिंधी के साथ भी ऐसा ही हो रहा है। जब कोई बोली खत्म होती है तो केवल शब्द नहीं जाते, पीढिय़ों का अनुभव भी धीरे-धीरे पीछे छूटने लगता है।
सच तो यह है कि संगरिया की यह तस्वीर अकेली नहीं है। उत्तर प्रदेश, बिहार, हिमाचल, उत्तराखंड, मध्य भारत और पूर्वोत्तर के कई छोटे शहरों और कस्बों में यही स्थिति दिखाई देती है। भोजपुरी, गढ़वाली, मालवी, बुंदेली, पहाड़ी और अनेक जनजातीय भाषाएं लगातार दबाव झेल रही हैं। अब परिवार बच्चों को वही भाषा सिखाना चाहते हैं जो स्कूल, नौकरी, इंटरव्यू और शहरों की दुनिया में मददगार हो। नतीजतन, कई मातृभाषाएं घर के भीतर भी सिकुड़ती जा रही हैं। भाषा केवल शब्दों का मामला नहीं है। उसमें एक समाज की यादें, उसकी आदतें और जीने का ढंग बसता है। गांवों में कई स्थानीय शब्द ऐसे होते हैं जो मौसम, खेती, पशुपालन और रिश्तों को बहुत बारीकी से व्यक्त करते हैं। जब कोई भाषा कमजोर पड़ती है तो उसके साथ लोककथाएं, कहावतें और पारंपरिक समझ भी धुंधली होने लगती है। कई बार जो बात एक स्थानीय बोली में सहज कही जा सकती है, वही दूसरी भाषा में अपना भाव खो देती है। भाषा का रिश्ता प्रकृति से भी गहरा है। ग्रामीण और आदिवासी समाजों ने सदियों तक पेड़-पौधों, पक्षियों, जल स्रोतों और मौसम से जुड़ा ज्ञान अपनी भाषाओं के माध्यम से आगे बढ़ाया। स्थानीय बोलियों में पर्यावरण से जुड़ी ऐसी बारीक जानकारी होती है जो किताबों में हमेशा नहीं मिलती। इसलिए जब कोई भाषा कमजोर होती है तो उससे जुड़ा प्रकृति का पुराना ज्ञान भी धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाता है।
बड़ा सवाल है कि क्या इसके लिए सिर्फ तकनीक जिम्मेदार है? हां, तकनीक ने नयापन दिया है लेकिन तकनीक को पूरी तरह दोषी नहीं ठहराया जा सकता। मोबाइल और इंटरनेट ने भाषाओं को बचाने के नए रास्ते भी दिए हैं। समस्या तब पैदा होती है जब हम खुद अपनी मातृभाषा को हीन या पिछड़ा मानने लगते हैं। अगर घरों में बच्चे अपनी बोली सुनेंगे ही नहीं तो केवल स्कूल या सरकारी नीतियां उसे कैसे बचा पाएंगी। भाषा का पहला पाठ हमेशा घर से शुरू होता है। इसमें कोई शक नहीं कि हिंदी और अंग्रेजी सीखना आज की जरूरत है लेकिन इसके साथ यह भी जरूरी है कि बच्चे अपनी मातृभाषा को समझें, बोलें और उसमें व्यक्त भावनाओं को पहचान सकें। घरों में स्थानीय बोली में संवाद, लोकगीत, कहावतें और कहानियां फिर से लौट सकती हैं। अगर घरों में बोली लौटे तो यह विरासत अभी भी बच सकती है। संगरिया जैसे छोटे कस्बों से उठती यह चिंता दरअसल पूरे देश की चिंता है। हर राज्य और हर शहर में कहीं न कहीं मातृभाषाएं धीरे-धीरे पीछे छूट रही हैं। हमारी अगली पीढ़ी कौन-सी भाषा बोलेगी, प्रश्न सिर्फ ये नहीं है। असली प्रश्न यह है कि क्या आने वाली पीढ़ी अपनी जड़ों की आवाज को भी पहचान पाएगी? (लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)
