
-आयशा
सपना कक्षा 6 की छात्रा थी, हंसमुख और मिलनसार। अचानक तेज बुखार आया, और इलाज के दौरान उसे कई अक्षमताएं (मल्टीपल डिसेबिलिटीज) हो गईं। दिसंबर 2023 से वह बिस्तर पर है। लेकिन सपना अकेली नहीं है। ऐसे कई बच्चे हैं जो सामान्य, खुशहाल जीवन से अंधेरे और बीमारी की जिंदगी में चले गए हैं।
भारत के शहरों में हजारों परिवार कचरा इकट्ठा करके, छांटने और बेचने से जीविका चलाते हैं। ये परिवार शहर की स्वच्छता और रीसायक्लिंग का अहम हिस्सा हैं, लेकिन हाशिए पर हैं। उनके बच्चे-जन्म से कचरे के ढेर और अनौपचारिक बस्तियों के पास-बुनियादी अधिकारों और सार्वजनिक सेवाओं से वंचित हैं।
दस्तावेजों की कमी और शिक्षा का अधिकार:- दिल्ली जैसे शहरों में, कई बच्चे जन्म प्रमाण पत्र या आधार जैसी पहचान दस्तावेजों के बिना बड़े होते हैं। इसके कारण स्कूलों में प्रवेश से वंचित रह जाते हैं। न्यू सीमापुरी (उत्तर-पूर्व दिल्ली) जैसे इलाकों में न जाने कितने बच्चे स्कूल से बाहर हैं क्योंकि उनके पास कोई पहचान दस्तावेज नहीं है। शिक्षा न मिलने के कारण कई बच्चे समय से पहले कचरा बीनने, दुकानों पर मदद करने या अन्य असंगठित काम में लग जाते हैं। कुछ बच्चे नशीली चीजों/लोगों के प्रभाव में भी आ जाते हैं। जो बच्चे संघर्ष कर स्कूल में दाखिला पाते हैं, उन्हें सहपाठियों और शिक्षकों की भेदभावपूर्ण दृष्टि, अनियमित उपस्थिति और शैक्षणिक सहयोग की कमी के कारण स्कूल छोड़ना पड़ता है।
स्वास्थ्य और पोषण में कमील:- अस्थिर आय और असुरक्षित जीवन परिस्थितियों के कारण कचरा बीनने वाले परिवारों के बच्चों को नियमित और पौष्टिक आहार नहीं मिलता। इसके परिणामस्वरूप कुपोषण, एनीमिया, स्टंटिंग और बार-बार बीमार होना एक आम हैं। कई बच्चों का इलाज शुरू हो चुका है, लेकिन उनके घर में खाने के लिए कुछ नहीं है। यहां सवाल यह उठता है कि जब बच्चे के पास खाना ही नहीं, तो दवाइयां कितनी असरदार होंगी?
खतरे में भारत क्योंकि खतरे में प्रारंभिक देखभाल:- छोटे बच्चों के लिए सुरक्षित और पोषण-संवेदनशील देखभाल और खेल-कूद का अभाव गंभीर परिणाम लाता है। आंगनवाड़ी या क्रेच न होने से बच्चे संज्ञानात्मक, भावनात्मक और सामाजिक विकास के अवसरों से वंचित रहते हैं। लंबे काम के घंटों में माताएं बच्चों को असुरक्षित और अस्वच्छ परिस्थितियों में छोड़ देती हैं, जिससे दुर्घटना, संक्रमण और कुपोषण का खतरा बढ़ जाता है।
सामाजिक बहिष्कार और कलंक:- इन बच्चों को बहुत अधिक संघर्ष करना पड़ता है। उन्हें समुदाय और स्कूल में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। स्कूल में शिक्षक इनके साथ अलग तरह का कठोर और असभ्य व्यवहार करते हैं। इससे उनका आत्म-सम्मान और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है, और उन्हें अधिकारों से वंचित रहने का खतरा रहता है तथा कितने बच्चे उस तरह के व्यवहार से परेशान होकर स्कूल जाना छोड़ देते हैं। कभी सोच कर देखें कि अगर यह लोग कूड़े का काम करना बंद कर दें तो क्या सरकार अपने बल पर इतने कूड़े को संभाल पाएगी? असल में यही लोग हमारे शहर को साफ रखे हुए हैं, हमारी गंदगी को उठाते हैं, साफ करते हैं, डिस्पोज करते हैं। फिर भी इनके साथ समाज का इस तरह का रूखा व्यवहार क्यों?
अधिकार-आधारित समाधान:- इन बच्चों की चुनौतियों का समाधान एक समग्र, अधिकार-आधारित दृष्टिकोण से ही संभव है। पोषण, स्वास्थ्य, शिक्षा और प्रारंभिक बाल देखभाल तक पहुंच सुनिश्चित करनी होगी। मोबाइल आंगनवाड़ी, सामुदायिक क्रेच, स्वास्थ्य आउटरीच और दस्तावेज बनाने में सहायता जैसे उपाय जरूरी हैं। साथ ही, कचरा बीनने वालों को श्रमिक मान्यता देकर उन्हें औपचारिक प्रणाली में शामिल करना अनिवार्य है।
कचरा बीनने वाले बच्चे केवल गरीबी के शिकार नहीं हैं, वे सुरक्षा, पोषण, शिक्षा और गरिमा के हकदार हैं। उनके कल्याण में निवेश करना दया नहीं, बल्कि नैतिक और संवैधानिक दायित्व है। उनकी जिंदगियों को दृश्य बनाना और उनकी जरूरतों को पूरा करना समावेशी और न्यायसंगत शहरों के निर्माण के लिए आवश्यक है। (लेखिका भोजन का अधिकार अभियान से जुड़ीं हैं)
