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Wednesday, June 19, 2024
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जातिवाद से पीड़ित भारतीय समाज को मुक्ति का नया रास्ता सुझाती किताब ‘जाति प्रथा’

-पुस्तक समीक्षक- सतीश भारतीय

समाजवाद को एक नई दिशा देने वाले डॉ. राममनोहर लोहिया ताउम्र अन्याय के खिलाफ लड़ते रहे। वे जातिवाद की तल्ख मुखालफत करते थे। डॉ. लोहिया का मानना था कि, भारत के गुलाम होने का मुख्य कारण जातिवाद है। जाति के प्रति लोहिया के 60 वर्ष पुराने विचारों और लेखों को, ‘जाति प्रथा’ नामक किताब के रूप में संजोया गया है। यह किताब समता ट्रस्ट भोपाल की सहायता से आकार बुक्स दिल्ली द्वारा प्रकाशित की गई है। किताब का पहला संस्करण वर्ष 2023 के अंत में आया है। 120 पेजों में लिखी गई इस किताब के अंदर 8 लेख समाए हुए है। देश के प्रख्यात गांधीवादी, समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर ने ‘जाति प्रथा’ नामक इस किताब का सम्पादन किया है।

हाल ही में आई किताब ‘जाति प्रथा’ की लोकप्रियता पुनः डॉ. लोहिया के वे शब्द दोहरा रही है, जब उन्होंने कहा था कि, ‘लोग मेरी बात सुनेंगे जरूर, लेकिन मेरे मरने के बाद।‘

डॉ. लोहिया के शब्दों पर आधारित ‘जाति प्रथा’ किताब, ना सिर्फ जातिवाद में जकड़े भारतीय समाज का मुखौटा पेश करती है, अपितु जातिवाद जैसी बुराई से मुक्ति का एक नया रास्ता भी सुझाती है। तो चलिए हम रुख करते हैं कि, डॉ. लोहिया के शब्दों से गुथी और रघु ठाकुर द्वारा संपादित किताब ‘जाति प्रथा’ क्या आयाम पेश करती है।

‘जाति प्रथा’ किताब के शुरुआती पन्नों पर जब हम नजर डालते हैं, तब हमें डॉ. राम मनोहर लोहिया के महान जीवन का परिचय मिलता है। इस जीवन परिचय में बताया गया कि, डॉ. लोहिया ने जर्मनी के होमबोल्ट विवि से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। जर्मनी से लोहिया जब भारत आए, तब कांग्रेस की गतिविधियों में भागीदारी ली। फिर, 1934 में कांग्रेस के अंदर सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। आगे पंडित जवाहरलाल नेहरु के अनुरोध पर लोहिया ने 1937 से 1939 के बीच कांग्रेस के विदेश विभाग के सचिव की जबावदेही संभाली।

जीवन परिचय में आगे जिक्र किया गया कि, डॉ. लोहिया ने 1942 में भूमिगत रेडियो का संचालन किया। इसी वर्ष लोहिया लाहौर जेल में भयंकर यातना का शिकार हुए। उन्होंने 1946 में गोवा मुक्ति आंदोलन का नेतृत्व किया। इसके बाद वर्ष 1948 एक ऐसा वक्त रहा जब लोहिया ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की। वर्ष  1963 में उन्होंने लोकसभा के उप-चुनाव में जीत के साथ संसद में प्रवेश किया। संसद के पटल पर लोहिया गरीबों और पिछड़ों के सबसे बड़े मसीहा बनकर उभरे। वे जीवन भर गरीब, पिछड़े, शोषित, किसान, मजदूर वर्ग के साथ जिये और इनकी आकांक्षाओं का प्रतीक बन गए। डॉ. लोहिया की महत्वपूर्ण रचनाओं में ‘मार्क्स’, ‘गांधी एवं समाजवाद’ ‘व्हील्स ऑफ हिस्ट्री’, ‘इंटरवल ड्यूरिंग पॉलिटिक्स’ उल्लेखनीय है। वह ‘मैनकाइन्ड’ एवं ‘जन’ के संपादक भी रहे।

इसके आगे किताब में काउंसिल फॉर सोशल डेवलपमेंट नई दिल्ली में पदस्त प्रो. अशोक पंकज प्राक्कथन के जरिए जाति-प्रथा के निवारण संबंधी दृष्टिकोणों की व्याख्या करते हैं। इन दृष्टिकोण में महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव अंबेडकर, ई. वी. रामास्वामी एवं डॉ. राम मनोहर लोहिया के विचार उल्लेखनीय हैं।

गांधी के दृष्टिकोण में छुआछूत जाति प्रथा की कोख से उपजी एक बुराई है। एक प्रकार से गांधी धर्म, वर्ण-व्यवस्था, जाति-प्रथा को प्रथक-प्रथक देखते थे। गांधी का मानना था कि, जाति-प्रथा एक सामाजिक बुराई है, जिसे हिंदू धर्म से जोड़ना उचित नहीं। गांधी यह भी मानते थे कि, व्यक्ति में सुधार से ही सामाजिक सुधार लाया जा सकता है।

वहीं, गांधी के दृष्टिकोण के विपरीत डॉ. अंबेडकर और पेरियार ने जाति प्रथा की हिंदू धर्म के सामाजिक आधार के रूप में व्याख्या की है। इन्होंने जाति-प्रथा का मूल हिंदू धर्म शास्त्रों में पाया। चूंकि, जाति-प्रथा हिंदू धर्म का सामाजिक और सांस्कृतिक आधार है। ऐसे में अंबेडकर और पेरियार इस निष्कर्ष के साझी थे कि, जाति-प्रथा का निवारण, हिंदू धर्म में सुधार द्वारा ही संभव है। जब उनको यह लगा कि, हिंदू धर्म में सुधार संभव नहीं। तब उन्होंने हिंदू धर्म त्यागकर ही जाति-प्रथा से मुक्ति पाने का रास्ता अपनाया। वहीं, आगे डॉ. अंबेडकर और पेरियार ने बौद्ध धर्म को अपने दर्शन का आधार बनाया।

उपरोक्त विचारकों से भिन्न, डॉ. लोहिया ने यह माना कि, ‘जाति से विद्रोह में हिंदुस्तान की मुक्ति है’। लोहिया ने विदेशी आक्रमण में भारत की हार का कारण जातीय विभाजन को माना। जाति व्यवस्था से निपटने के लिए लोहिया ने सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों को हथियार बनाया।

किताब में इसके उपरांत समता न्यास ट्रस्ट के अध्यक्ष मदन जैन लिखते हैं कि, डॉ. लोहिया आमजन के बीच जिंदा और चर्चित रहे। केवल विशिष्ट संभ्रांत तबके या पुस्तकालयों के कैदी ना बन जाएं, इसलिए समता ट्रस्ट भोपाल (मध्य प्रदेश) ने लोहिया की छोटी-छोटी पुस्तकों को ‘ना घाटा ना मुनाफा’ के आधार पर सस्ती दरों में प्रकाशित करने का एक नया रास्ता चुना है। इस सफर का प्रयास यही है कि, लोहिया, उनके पास तक पहुंच सकें, जिनके लिए सारा जीवन लोहिया लड़ते और संघर्ष करते रहे।

‘जाति प्रथा’ किताब के संबंध में गांधीवादी, समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर किताब के 15 से 20 पेजों के बीच लिखते हैं कि, समता का समाज बनाने के लिए डॉ. लोहिया की यह पुस्तक मूल आधार प्रस्तुत करती है। जातिवाद और विषमता मिटाने के लिए तरीके सुझाती है। रघु ठाकुर आगे लिखते हैं कि, मुझे विश्वास है कि, एक नया बराबरी का समाज बनाने के लिए यह पुस्तक ‘बीज पुस्तक’ साबित होगी।

आगे की पंक्तियों में रघु ठाकुर जातिवाद के उदाहरण पेश करते हुए लिखते हैं कि, मजदूर आंदोलनों में नारा लगाया जाता है कि, ‘दुनियां के मजदूर एक हो’ मगर शाम होते-होते मजदूर जातियों में बंट जाते हैं। कोई दलित बच्चा अगर स्कूल में टीचर के पानी का मटका छू ले। तब बच्चे को पीटा जाता है। यदि बड़ी जाति की लड़की छोटी जाति के लड़के से शादी कर ले, तब लड़के को जान से मार दिया जाता है। यह पैदा की जाने वाली घटनाएं यदि जातिवाद नहीं हैं तो और क्या हैं?

किताब के पहले लेख ‘जाति प्रथा का नाश क्यों और कैसे?’ का जब हम अध्ययन करते हैं, तब हमें जाति को लेकर कुछ अंश उल्लेखित मिलता है। जिसके जरिए बताया गया है कि, जाति की सीमा के अंदर हमारा जीवन चलता है और सुसंस्कृत लोग जाति प्रथा के विरुद्ध हौले-हौले बात करते है जबकि, वह जाति की सीमा से घिरा रहना चाहते हैं।

जीवन के बड़े तथ्य जैसे, जन्म, मृत्यु, शादी, भोज और अन्य सभी रस्में जाति के चौखटे में होती है। अन्तर्जातीय विवाह का मतलब उच्च जाति के समुदायों के बीच में विवाह होना माना जा रहा है। यह साफ है कि, जाति दुनियां में बिना किस्त का बीमा बन गई है।

इस लेख में आगे बताया गया कि, अंग्रेज तो देश से चले गए लेकिन उन्होंने जातीय पार्टियों को देश में पैदा किया है। वे आजाद हिंदुस्तान में भी चल रहीं हैं। हिंदुस्तान का कामगारी, दक्षिण हिंदुस्तान और जनता पार्टी जैसी अन्य पार्टियां ना सिर्फ क्षेत्रीय पार्टियां हैं, बल्कि जातीय पार्टियां भी हैं।

जाति का तीन अलग-अलग किस्म से विरोध होता है। एक जुबानी, दूसरा निचले स्तर का और तीसरा वास्तविक। हिंदुस्तान की आबादी में ऊंची जाति वाले 20 प्रतिशत से अधिक नहीं, मगर देश की नेतागिरी की लगभग 80 प्रतिशत जगहों पर वहीं जमें हुए हैं।

किताब का दूसरा लेख है ‘जाति’। यह लेख देश में व्याप्त जातियों के हालात बयां करता है। इस लेख में यह भी समाहित है कि, ब्राह्राण होना ऊंचा कहलाता है। फिर, जो सुसंस्कृत ब्राह्राण है वह बाकी ब्राह्राणों से तो बहुत ऊंचा हो जाता है। एक ब्राह्राण है जो राज चलाता है। दूसरा शिव महाराज के ऊपर बेल-पत्र चढ़ाता है। दोनों में बड़ा फर्क हो जाता है। वह बेल पत्र चढ़ाने वाला सच पूंछों तो छोटी जाति का हो जाता है और जो नौकरी करता है वह ऊंची जाति का हो गया है।

लेख यह भी वर्णन करता है कि, आज भारत के नेता अपने भाषणों में जनता के लिए कर्तव्यनिष्ठा की बात करते हैं, मगर अधिकारों को छोड़ देते हैं। हिंदुस्तान की जनता कर्तव्य करना तभी सीखेगी जब उसमें अपने अधिकारों की भावना आ जाएगी। अधिकारों के लिए यह जरूरी है कि जनता के मन में यह स्थायित्व लाया जाए कि, वह नीची जाति की नहीं है।

जब ‘जाति’ नामक दूसरे लेख को अंत तक पढ़कर हम पेज पलटते हैं, तब 69 पेज से किताब के तीसरे लेख ‘जाति प्रथा और गुलामी’ की शुरुआत हो जाती है। यह लेख दो पेजों की संक्षिप्तता में समाया है। लेकिन, लेख का अंश काफी रोचक है। लेख के जरिए लिखा गया कि, सारी दुनियां में तो छोटे-बड़े का फर्क है। लेकिन, हमारे यहां तो आकाश-पाताल का फर्क है। मिसाल के लिए, अमरीका में तो सफाई मजदूर की भी तनख्वाह 1300 रूपए है। वहां कलेक्टर की तनख्वाह 6,000 रूपए है। अमरीका मे सबसे कम मजदूरी भी 1,300 रुपए है। वहां कूड़े की गाड़ी चलाने वाला भी 6,400 रुपए पाता है और बड़ा अफसर 6,000 रुपए। हमारे देश में छोटा 50 रुपए और बड़ा कलेक्टर 6,000 रुपए पाता है। वहीं, कलेक्टर जैसे अधिकारियों के बंगला-गाड़ी जैसी अन्य सुविधाएं अलग से मिलती है।

दुनियां में छोटे-बड़े का फर्क जन्म के हिसाब से नहीं, पैसे, पढ़ाई, वगैरह, से होता है। लेकिन, अपने देश में छोटे-बड़े का फर्क इससे लगाया जाता है कि, ‘व्यक्ति किस जाति’ में जन्मा है।

किताब का चौथा लेख है, ‘छोटी जातियां और लासा’। वहीं पांचवा लेख है, ‘सुक्खो रानी और ग्वालियर महारानी’। यह दोनों लेख एक-एक पेज में ही समाए हैं।

चौथे लेख में यह जिक्र किया गया कि, एक समय कांग्रेस में शामिल रहे डॉ. लक्ष्मण रावत ने समाजवाद की ओर अपना रुख कर लिया। तब रावत की बोली बहुत तब्दील गई। वह भाषणों में कहने लगे कि, अयोग्य को ऊंची जगहों पर बैठा कर योग्य बनाया जाएगा। साठ सैकड़ा ऊंची जगहों पर छोटी जातियों को बैठाओ, तभी देश सबल बनेगा।

वहीं पांचवा लेख यह विश्लेषण करता है कि, दुनियां के देशों में आर्थिक संपत्ति और साधनों की जबरदस्त गैर-बराबरी मानवता की प्रगति में बहुत बड़ी रुकावट है। भारत में अंग्रेजी अभिमुखी, अमीर, ऊंची जाति का दर्जा प्राप्त एक प्रतिशत व्यक्ति 99 प्रतिशत जनता को अपने बंधन में जकड़े हुए है।

‘जाति प्रथा’ किताब का छंटवां लेख है, विशेष अवसर क्यों? यह लेख वर्ष 1962, माह जून का है। लेख में बताया गया है कि, देश में छोटी जाति वालों की तादाद 38 करोड़ है। वहीं, बड़ी जाति वालों की तादाद 9-10 करोड़ है।

इस लेख में आगे व्याख्यात है कि, भारत की जनता उदासी के कारण गुलाम होती रही है। वहीं, जनता की उदासी का सबसे बड़ा कारण जाति प्रथा रही है। इसी के साथ बड़े-छोटे आदमी का आर्थिक फर्क है। लेख में आंकड़ों को प्रदर्शित करते हुए यह भी बताया गया कि, हमारा देश संसार का सबसे भूखा और रोगी देश है।

किताब का छंटवा लेख यह भी बताता है कि, सामाजवादी दल हिंदुस्तान के इतिहास में पहला राजनीतिक दल है जिसने जाति प्रथा को समझा है और राष्ट्रवर्धक जाति तोड़ो नीति को चलाया है।

किताब में दर्ज सातवां लेख है, ‘द्रौपदी और सावित्री’। इस लेख के जरिए स्त्री व पुरुष के बीच जो सदियों से मौजूद लैंगिग भेदभाव है, उसे उजाकर किया गया। लेख में द्रौपदी की जीवन गाथा का वर्णन किया गया। वहीं, राम और सीता के जीवन का उल्लेख भी इस लेख में मिलता है। लेख में सावित्री के जीवन की झलकियां भी दर्ज है। सावित्री के संबंध में लेख कहता है कि, सावित्री पवित्रता शब्द की प्रतीक हैं। इसकी वजह था सावित्री का अपने पति के प्रति अटूट प्रेम। इसी प्रेम के चलते अपने मृत पति को सावित्री यमराज के यहां से पुनः जीवित करवा लाई थी। लेख में इस ओर भी इशारा किया गया है कि, समाज स्त्री-पुरुष में सबसे ज्यादा स्त्री को झुकाता है।

भारतीय समाज में सदियों से स्त्रियां त्याग करती आ रही हैं। बार-बार स्त्रियों का सम्मान, गरिमा, अधिकार खतरे में पड़े हैं। मगर स्त्री समानता, अधिकार पर इस तरह ध्यान नहीं दिया गया कि, देश में स्त्रियां स्वतंत्रता से गरिमापूर्ण जीवन जी सकें।

इस किताब का आठवां और अंतिम लेख है, ‘अवसर से योग्यता’। यह लेख वर्ष 1961, माह दिसंबर का है। लेख में लोहिया लिखते है कि, मैं कभी भी ब्राह्राण विरोधी नहीं रहा, पर हमेशा जाति विरोधी रहा हूं।

लेख में आगे एक नए सिद्धांत का जिक्र किया गया। सिद्धांत यह है कि, ‘अवसर मिलने से योग्यता आती’ है। देश के सभी 60 प्रतिशत ऊंचे अवसर हिंदुस्तान की 90 प्रतिशत आबादी यानी शूद्र, हरिजन, अल्पसंख्यकों जैसी पिछड़ी जातियों, औरत और आदिवसियों को मिलने चाहिए।

लेख में आगे यह लिखा गया है कि, देश में एक नियम चलता है कि हर एक आदमी अपनी जाति वाले आदमी को ही पसंद करे। जाति की बात बंद करने का मतलब होगा हिंदुस्तानी स्थिति की सबसे महत्वपूर्ण और एकमात्र वास्तविकता से आंखें भींच लेना।

किताब के अंतिम पन्ने दो अन्य लेखों में समाहित हैं। इन लेखों को शब्दों का रूप गांधीवादी, समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर ने दिया है। किताब के अंत में पहले लेख, ‘ई. डब्ल्यू. एस. आरक्षण निर्णय कितना तार्किक है, में रघु ठाकुर लिखते हैं कि, संविधान में स्पष्ट कहा गया है कि, ‘भारत सरकार उन जातियों और वर्गों की पहचान करेगी जो शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़े हैं।, इसमे कहीं भी आर्थिक शब्द का उल्लेख नहीं है। अगर, संविधान सभा की बहस पढ़ें, तब उसमे भी कहीं आर्थिक आधार पर आरक्षण का निर्णय नहीं है।

जब पिछड़ी जातियों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण देने के निर्णय पर गंभीर बहस हुई और आर्थिक आधार पर क्या आरक्षण दिया जा सकता है, इसकी भी चर्चा हुई। तब सर्वोच्च न्यायालय की तत्कालीन पीठ ने स्पष्ट कहा था कि, आरक्षण की कसौटी केवल किसी जाति या समूह का सामाजिक-शैक्षणिक पिछड़ापन है। ऐसे में आर्थिक कसौटी पर आधारित आरक्षण मुझे, असंवैधानिक लगता है।

‘जातिगत जनगणना, नामक अंतिम लेख से ‘जाति प्रथा’ किताब अपने अंत पर पहुंच जाती है। इस लेख को लिखने वाले रघु ठाकुर उल्लेख करते हैं कि, देश में जातिगत जनगणना को लेकर पिछले 12-13 वर्ष बहस चलती रही है। जब पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के समय जनगणना हुई, तब यह मुद्दा भी उठाया गया कि, देश में जनगणना के साथ जातीय जनगणना भी कराई जाए। जब सरकार जनगणना के लिए 6 हजार करोड़ रूपए खर्च कर रही थी, तब उसमें जातीय जनगणना का कॉलम और जोड़ा जा सकता था। मगर, कांग्रेस जबान से भले ही पिछड़े वर्गों के साथ रही हो, पर कर्म से कभी नहीं रही। मंडल कमीशन ने भी सन् 79-80 में टाटा इंस्टीट्यूट से जातियों की संख्या का आकलन कराया था। इस आकलन में पिछड़े वर्ग की आबादी को 52 प्रतिशत माना गया था। हालांकि, हिंदुस्तान की संसद के सभी दलों ने एकजुट होकर कभी इस रपट को पेश करने की मांग नहीं की।

इस लेख में रघु ठाकुर आगे लिखते हैं कि, मैं जातिवाद के खिलाफ हूं और जाति मिटाना चाहता हूं। लेकिन, जाति छिपाने से नहीं मिटेगी। जाति को मिटाने के लिए अन्तर्जातीय विवाह, अन्तरधर्मीय विवाह और भागीदारी में वृद्धि जैसे कदम उठाने होंगे। तभी हम जाति प्रथा से मुक्ति पा कर भारतीय समाज में एकता स्थापित कर पाएंगे।

‘जाति प्रथा’ नामक इस किताब में डॉ. लोहिया के विचार जातिवाद की परतें उधेड़ते हुए मूल रूप से यह बताते हैं कि, जाति प्रथा ने भारत में एक ऐसी व्यवस्था बना दी है कि, ‘जनता बेजान है’ और ‘विशिष्ट वर्ग कपटी है’। (सतीश भारतीय एक स्वतंत्र पत्रकार और लेखक हैं, वह मध्यप्रदेश में रहते हैं)

 

 

 

 

 

 

 

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