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Tuesday, July 16, 2024
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न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पूरे खतरे में

 

-मुनेश त्यागी

भारत के सर्वोच्च न्यायालय के रिटायर्ड न्यायमूर्ति अब्दुल नजीर को केंद्र सरकार द्वारा आंध्र प्रदेश का गवर्नर बनाने बनाए जाने का कांग्रेस ने पुरजोर विरोध किया है और उसने अपने बयान के समर्थन में पूर्व मंत्री अरुण जेटली के बयान को उद्धृत किया है। अरुण जेटली ने कहा था कि ‘न्याय मूर्तियों के रिटायरमेंट के पूर्व के फैसले, रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले कार्यों से और पदों से प्रभावित होते हैं।‘

बीजेपी ने कांग्रेस के इस विरोध का जमकर विरोध किया है और सरकार के इस फैसले का मजबूती से समर्थन किया है। उसने सरकार का पक्ष लेते हुए कहा है कि यह सरकार के ऊपर है कि वह किसी भी न्यायमूर्ति का रिटायरमेंट के बाद उपयोग करे, उसकी विद्वता का फायदा उठाएं। मगर उसने अरुण जेटली के उपरोक्त बयान पर चुप्पी साध ली है।

न्यायमूर्ति अब्दुल नजीर ने अपने कार्यकाल के अंतिम समय में बाबरी मस्जिद केस, तीन तलाक केस और नोटबंदी के केस में, सरकारी नीतियों और सरकार के रुख के हिसाब से अपने निर्णय दिए थे। अपने कार्यकाल में न्यायमूर्ति अब्दुल नजीर मनुस्मृति और मनु के विचारों के सबसे ज्यादा समर्थक रहे हैं। जबकि संविधान में मनुवाद का और मनुस्मृति का पूर्ण रूप से निषेध किया गया है। इसका इनाम उन्हें अब अपने रिटायरमेंट के एक महीने के बाद ही मिल गया है। जब केंद्र सरकार ने उन्हें आंध्र प्रदेश का राज्यपाल नियुक्त कर दिया है।

इससे पहले भी वर्तमान सरकार, भारत के मुख्य न्यायाधीश सदाशिवम को केरल का राज्यपाल बना चुकी है और भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को राज्यसभा का सांसद बना चुकी है। वर्तमान सरकार की कार्यप्रणाली दिखा रही है कि वह पहले तो अपने चहेते न्यायमूर्तियों से अपनी नीतियों और नियत के हिसाब से फैसले दिलवाती है और बाद में अपनी राजनीति के तहत उन्हें मनमाने पदों से नवाजती है।

सरकार को अपने इस कदम पर कोई पछतावा नहीं है। माना कि पिछली कांग्रेसी सरकार ने भी इसी नीति के तहत कई न्यायमूर्तियों को रिटायरमेंट के बाद उनका मनमाफिक प्रयोग और उपयोग किया था। जो कांग्रेस के जमाने में गलत था और बीजेपी उसका विरोध करती थी, अब वह सब बीजेपी के लिए कैसे सही हो गया है?

यहीं पर सवाल पैदा होता है जो पहले गलत था, वह अब सही और वाजिब कैसे हो गया? यह सरकार की दोमुंहा नीति है। जो बात पहले गलत थी, वह आज भी उतनी ही गलत है। सरकार यह सब जान पूछ कर और एक सोची समझी राजनीति के तहत कर रही है।

सरकार की ये समस्त कार्यवाहियां पूर्ण रूप से भारत की न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सबसे बड़ा हमला है। भारत की सरकार हमारी न्यायपालिका और संविधान के मूलभूत सिद्धांतों पर, समाजवाद, जनतंत्र और गणतंत्र के मूलभूत सिद्धांतों पर भयंकर हमला कर रही है। सरकार की ये समस्त कार्यवाहियां भारतीय संविधान के मूलभूत सिद्धांतों के खिलाफ हैं। इनका किसी भी दशा में समर्थन नहीं किया जा सकता।

भारत की सरकार अब एक प्रतिबद्ध यानी कमिटिड ज्यूडिशियरी चाहती है जो सरकार की नीतियों और कानूनों का समर्थन करे, उसकी हां में हां मिलाए और जो अपनी मूलभूत शक्ति ‘ज्यूडिशल रिव्यू‘ का प्रयोग जनहित में ना करके सरकार के हित में करे। यह सब एक स्वतंत्र न्यायपालिका के पूरी तरह से विरोध में है। अब सरकार न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर अंदर और बाहर से भयानक हमला कर रही है और संविधान की जरूरी प्रावधानों को जानबूझकर रौंकने पर आमादा हो गई है।

सरकार को यह सब करने में कोई परेशानी या अफसोस नहीं है। अब यह उसकी नीति हो गई है। सरकार बाजारवाद की नीतियों पर चल रही है, वहां एक स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका उसके रास्ते में आ रही है, उसकी स्वछंदता के मार्ग में रोड़े अटका रही है। अतः उसने एक स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका का विचार त्याग दिया है। अब वह अपने सोचे समझे तरीके से न्यायपालिका के जजों को प्रभावित करने की नीतियों पर चल रही है।

अब हमारी न्यायपालिका की आजादी और निष्पक्षता खतरे में पड़ गई है। यह सब एकदम अपमानजनक और बेहद शर्मिन्दगीपूर्ण है और ‘भारत एवं हम भारत के लोगों‘ के लिए एक गंभीर सदमा और आघात है और संविधान के मूलभूत सिद्धांतों और आदर्शों के बिल्कुल खिलाफ है। सरकार की इन संविधान विरोधी गतिविधियों और नीतियों के खिलाफ, एकजुट होकर सामना करने की अलावा, हमारे सामने और कोई रास्ता नहीं रह गया है।(लेखक पेशे से वकील, उत्तर  प्रदेश जनवादी लेखक संघ के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और जनवादी लेखक संघ मेरठ के सचिव हैं)

 

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