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Sunday, May 26, 2024
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बंजारा-एक कौम जो सफर का पर्याय बन गई

-पारस बंजारा

सफर अथवा यात्रा प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का अभिन्न अंग है परंतु कोई जाति यदि सफर की पर्याय ही बन जाए तो यह अनूठी मिसाल है। यह कौम है बंजारा, बंजारा जिनका न कोई ठौर-ठिकाना, न घर-द्वार और न किसी स्थान विशेष से लगाव, यायावरों सी जिंदगी जीते हुए आज यहां ठहर गए और कल का पता नहीं कि पूरा कुनबा कहां पड़ाव डाले? वे सदियों से देश के दूर-दराज इलाकों में निर्भयतापूर्वक यात्राएं करते रहे हैं। एक समय था जब बंजारे देश के अधिकांश भागों में परिवहन, वाणिज्य, पशुपालन और दस्तकारी से अपना जीवनज्ञापन करते थे। अकाल के बुरे दिनों में इनके मार्ग में पड़ने वाले गांव के लोग बड़ी उत्सुकता से इनकी प्रतीक्षा करते थे।

हिंदी की बोलियों में न जाने कब बंजारा शब्द सफर का प्रतीक बन गया। डॉ. श्रीराम कहते है “बंजारा शब्द व्यक्ति वाचक संज्ञा तो है ही इसके अतिरिक्त निःस्पृह, निरपेक्ष और परिवाज्रक मन का भी परिचायक है। बंजारा पथ पर अंकित अपने पदचिन्हों को मिटाता चलता है। उसे न तो भविष्य गुदगुदाता है और न ही आतंकित करता है। ऐसा मन जो आसक्ति से रिक्त किंतु साहसिक-स्पंदनों से परिपूर्ण रहता है। जो व्यक्ति किसी बंधन में जीवन व्यतीत करने की अपेक्षा मरण का वरण करता है, जिसे विश्राम और आश्रम दोनों से अरुचि है, जो यात्रा को ही मंजिल मानता है। दीयाबाती के समय कहीं रुकना भी पड़े तो पांवों में घुंघरू बंधे जाते है। वह रात-रात भर ढप्प पर थिरकता रहता है। जब घना जंगल दर्द से पुकारता है तो बंजारे के गले से निकला गीत वातावरण को मिठास से सरोबार कर देता है।“

ग्रियसन ने बंजारा शब्द की व्युत्पति संस्कृत के वाणिज्यकार अर्थात् व्यापार करने वाला तथा प्राकृत के वाणिज्य आरों से सिद्ध करने का प्रयास किया है। राजस्थानी में वाणिज्य का तद्वव रूप बिणज प्रचलित है। वणिजना, बणिजना और बिणजना का तात्पर्य है-व्यापार करना। मराठी में भी बंजारा शब्द चलते-फिरते व्यापारी के लिए प्रयुक्त हुआ है।

‘व्या बंजारे वृषभ कटक, व्यांजी पाहून, व्याचा शोक‘

बंजारों का इतिहास देखा जाए तो यह कौम निडर, निर्भीक, साहसिक, लडाकू और जुझारू रही है। उसने अपने आप को अन्य समुदाय से अलग रखा है। बंजारा राजस्थान का ऐसा घुमंतू समुदाय है जो अन्य क्षेत्रों में भी पहुंचकर अपनी परंपरा को बहुत कुछ सुरक्षित रखे हुए है। भारत में बंजारा और यूरोप में ‘‘जिप्सी‘‘ अथवा ‘‘रोमा‘‘ नाम से प्रसिद्ध इस जन समुदाय की भाषा से पश्चिमी राजस्थान के उन क्षेत्रों को खोजा जा सकता है, जहां से ये लोग देश-विदेश में गए। कई इतिहासकार बंजारों को सिंधु घाटी सभ्यता से भी जोड़ते है जो इनकी संस्कृति में झलकता भी है। देश की आदिम जनजातियों में बंजारा समुदाय तीन कारणों से उल्लेखनीय है-

  1. उन्होंने किसी स्थान की सीमा को स्वीकार नहीं किया।
  2. उसमें गैर बंजारा समुदाय भी शामिल होता रहा।
  3. स्वयं सदैव सफर में रहकर देश में स्थायी रूप से बसने वाले लोगों के विकास में योगदान दिया।

बंजारों ने जल सरंक्षण के काम कराए जिसके तहत कई तालाब, बावड़ी, कुओं का निर्माण कराया है।  जिसमें राजस्थान के उदयपुर की प्रसिद्ध पिछोला झील, पचपदरा में कई तालाब व अनाम बहुत से जलाशयों के साथ ही मध्य प्रदेश के सागर का लक्खी शाह तालाब का निर्माण कराया है। ये देश के लिए बंजारों का योगदान है।

बंजारों ने प्राचीन भारत में यातायात, वस्तु-विनिमय, परिवहन और विपणन व्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इन्होंने व्यापार के जरिए देश को विभिन्न भागों से जोड़ा है। नमक का व्यवसाय करने के दौरान अरावली पर्वत शृंखला मे रास्ते (प्रमुख रूप से देसूरी घाटा व अरावली मे अन्य रास्ते) बनाकर बंजारों ने पश्चिम राजस्थान (मारवाड़) को मेवाड़, मालवा व देश के अन्य हिस्सों से जोड़ा है।

संपूर्ण भारत में बंजारा समाज की कई उपजातियां हैं, जिनमें राजस्थान में बामणिया, लबाना, मारू भाट और गवारियां उपजाति विद्यमान है।

यह समुदाय सदैव उत्पीड़न का शिकार होता रहा है चाहे सामंतशाही व्यवस्था से या आजादी से पूर्व अंग्रेजों से या फिर वर्तमान में सरकारी नीति से। आजादी की लड़ाई में बंजारा समुदाय का विशेष योगदान रहा। कई लोग अनाम उत्सर्ग कर शहीद हो गए, लेकिन उन्हें गुमनामी में रखा गया। इस प्रकार बंजारा समुदाय के छद्य युद्ध से परेशान होकर प्रतिक्रिया स्वरूप अंग्रेजों ने इन्हें परेशान करते हेतु दमनात्मक कार्यवाही की युक्ति निकाली और सन् 1871 में अंग्रेजों ने ‘‘आपराधिक जनजाति अधिनियम‘‘ पारित किया।

टुकर्सिया हवा को छोड़ मिया,

मत देस-विदेश फिरे मारा,

का जाक अजल का लूटे हैं,

दिन-रात बजाकर नक्कारा।

क्या गेहूं, चावल, मोठ, मटर,

क्या आग धुआं और अंगारा,

सब ठाट पड़ा रह जाएगा,

जब लाद चलेगा बनजारा।।

-नजीर अकबराबादी

   इस अधिनियम की आड़ में देश की आजादी के आंदोलन मे सहयोगी बंजारों को पकड़ा जाने लगा। इन पर विभिन्न धाराओं में आपराधिक मुकदमे दर्ज किए जाने लगे और सिर्फ इतना ही नहीं इनको जन्मजात अपराधी घोषित करने लगे। इतना होने पर भी बंजारा समुदाय की गतिविधियां पूर्ववत चलती रही, अंततः अंग्रेजों ने बंजारा समुदाय को आर्थिक रूप से कमजोर करने के लिए उनका व्यवसाय छीन कर बेरोजगार करने का षड़यंत्र रचा। इसके तहत अंग्रेजों ने 31 दिसंबर 1859 को नमक, जो कि इनका पैतृक व्यवसाय था, पर ‘नमक कर विधेयक‘ लाकर प्रतिबंधित कर दिया। बंजारा समुदाय ने इसका विरोध प्रदर्शन किया। गांधी के साथ 1930 में दांडी मार्च भी किया। इस तरह देश भर में तो 1930-32 में नमक सत्याग्रह फैल गया मगर नमक के व्यापारी बंजारों की आर्थिक दृष्टि से कमर टूट गई। अंततः हार कर उन्हें अपना पैतृक व्यवसाय बदलना पड़ा।

नमक को ये बैलों पर लादकर परिवहन करते थे। अंग्रेजों के दुष्चक्र के चलते नमक के व्यापार से तो इनका संबंध छूट गया मगर बैलों से नाता जुड़ा रहा और इन्होंने कृषि योग्य बैलों के क्रय-विक्रय का व्यापार शुरू किया जो लगभग एक शताब्दी तक चला मगर सरकार द्वारा 25 अगस्त 1995 में ‘राजस्थान गोवंशीय पशुवध का प्रतिशेध और अस्थायी प्रवृजन या निर्यात का विनिमय अधिनियम 1995‘ पारित किया। कानूनी रूप (कानूनी रूप से मान्य दस्तावेज होते है) से सही होने के बावजूद भी इस अधिनियम की आड़ में विभिन्न पशु मेलों से आ रही गाड़ियों की अवैध रूप से तलाशी करते है तथा पशु मालिक बंजारे की स्त्री, पुरुष, बच्चे के साथ मारपीट की जाती है उनसे रुपए छीन लेते है तथा उक्त अधिनियम की विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज करवा, बैलों को गौशालाओं को सुपुर्द कर दिया जाता है। कोर्ट-कचहरी के चक्कर, वकीलों की फीस आदि से परेशान हो कई बैल मालिक बंजारे बैलों को छोड़ ही देते हैं तथा ये मुकदमे 7-8 वर्ष तक चलते रहते हैं जिससे पीड़ित बंजारा समुदाय के लोगों को सामाजिक, शारीरिक, मानसिक व आर्थिक क्षति की पीड़ा को झेलना पड़ता है जबकि ये कानून का पूर्ण पालन करते है। इन्हीं सबके  परिणास्वरूप बंजारा समुदाय ने अपने सदियों पुराने पारंपरिक व्यवसाय को छोड़ कर आज इनके महिला-पुरुषों को गली-गली में गोंद, कंबल और चारपाई बेचने व शहरों में पलायन होने को मजबूर होना पड़ रहा है। जहां इन्हें पूरी मजदूरी नहीं मिलती, बाल श्रम व ठेकेदारों की यातनाओं का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में देश में बढ़ते औद्योगिकीकरण, नगरीकरण और वैश्विकरण जैसी अवधारणाओं ने भी आग में घी का काम किया है, इससे समुदाय के अस्तित्व को खतरा महसूस होने लगा है।

जीवन भर घुमंतू जीवन व्यतित करने वाले बंजारे अब बसने लगे हैं तो आज भी अपने दस्तावेज,  सांस्कृतिक पहचान, आवास की भूमि, घरो के पट्टे, आवास, श्मशान घाट की जमीन, शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, बिजली जैसी आधारभूत सुविधाओं से महरूम है और सरकारी संरक्षण के अभाव में अपनी पारंपरिक कला, संस्कृति एवं पुरातात्विक महत्व के स्थानों को खोने को मजबूर हो रहे है।

इस तरह पचपदरा झील व सांभर झील से मेवाड़, मालवा व देश के विभिन्न हिस्सों मे सफर करने वाले और पशुओं से अनन्य प्रेम करने वाले मतवाले बंजारों के रीति-रिवाज भी कम आकर्षक नहीं हैं। पूरा बामणियां बंजारा समुदाय बारह गोत्रों में विभाजित है। इन गोत्रों में गरासिया, नाड़ावत और गौड़ गौत्र को समाज में ठकुराई का पद प्राप्त है। जाति पंचायत में इनकी अध्यक्षता में ही किसी विवाद का निपटारा होता है। प्रत्येक टांडे का एक नायक मुखिया होता है।

बंजारा पुरुष सिर पर पगड़ी बांधता है, तन पर कमीज या झब्बा पहनता है, धोती बांधता है, हाथ में नारमुखी कड़ा, कानों में मुरकिया व झेले पहनता है और हाथ में लाठी रखता हैं। बंजारा नारी की वेशभूषा का आकर्षक बिंदु है उसकी केश सज्जा जिसमे ललाट पर बालों की फलियां गुंथ कर उन्हें धागों से चोटी से बांधी जाती है। इन फलियों पर चांदी के पान-तोड़े और बोर, शिरो-आभूषण बांधे जाते है। ठीक शिखा स्थल पर रखड़ी बांधी जाती है। गले में सुहाग का प्रतीक दोहड़ा पहना जाता है। हाथों में चूड़ा नाक में नथ, कान में चांदी के ओगन्या, गले में खंगाला, पैरों में कडियां, नेबरियां, लंगड, अंगुलियों में बिछीया, अंगूठे मे गुछला, कमर पर करधनी व कंदौरा, हाथों में चूड़ा, बाजूबंद, डोडिया, हाथ-पान व अंगुठिया पहनती है। प्रौढ़ महिलाएं घाघरा तथा युवतियां लहंगा पहनती है व लुगड़ी ओढनी ओढती है। बूढ़ी महिलाएं कांचली तथा नवयुवतियां चौली-ब्लाउज पहनती है तथा कुंवारी लड़कियां बुशर्ट पहनती है।

विवाह पारंपारिक तरीके से पारंपरिक वेशभूषा में होता है। बामणिया बंजारा का सांस्कृतिक पक्ष उसके परंपरागत तीज-त्यौहार से संबंध है। वे मुख्यतः गणगौर, राखी, नवरात्रा, हरियाली अमावस्या, दशहरा, दीपावली, भादवी दूज, गोवर्धन पूजा, होली आदि मनाते हैं।

लोकगीत व लोकनृत्य बंजारों के जीवन का अभिन्न हिस्सा है। महिलाएं आणा गीत, विवाह गीत, फाल्गुन गीत गाती है और पाई नृत्य, गुजरडी नृत्य एवं हमचीड़ो खेलती है। पुरुष शादी, आणा व सगाई के अवसर पर नगाड़े की ताल पर पंवाड़ा नृत्य, पाई नृत्य, शशी मारना आखेटाभिनय आदि करते हैं तथा रात्रि में यदा-कदा किसी स्थान पर बैठकर समवेत स्वर में लोकगाथाएं गाते हैं जिसमे हुंजू, ढोलामारू, सालंगा, पांडू, पानू-ठाकर, रूपा नायक, रामापीर, अमरासती व सरवरसिंग आदि लोक गाथाएं गाते हैं। साथ ही नवरात्रि मे खेलिया गाते है।

श्री रूपा नायक बामनिया बंजारों के आराध्यदेव है जो कि मूलतः गरासिया गौत्र में जन्मे थे। इसके अतिरिक्त गाथा जी, लोक देवता रामदेवजी को मानते है व लाला सती सहित अलग-अलग गौत्रों की सती माताएं होती है। बंजारों ने गोविंद गुरु जैसा व्यक्तित्व समाज को दिया जिन्होंने आदिवासियों को संगठित कर शोषण के विरुद्ध आवाज उठाई और भगत-पंथ की स्थापना की, जिसके आज भी हजारों अनुयायी है। मांगु गरासिया (ठेकेदार) ने समाज के इतिहास, सामाजिक जाति पंचायत मे सुधार, खर्चीले रीति- रिवाजों में बदलाव एवं सामाजिक कुरुतियों मे सुधार के कामों मे सक्रिय भूमिका निभाकर समाज को नई दिशा देने के क्षेत्र में काम किया।

जिस तरह बंजारा यात्रा का पर्याय और व्यवसाय का परिचायक बना और बाहरी जगत को सदैव प्रगतिशील सोच के साथ आगे बढ़ने का संकेत दिया, उसी तरह आंतरिक यात्रा कर आध्यात्मिक जगत में अलौकिक अनुभूतियां अनुभूत करने की ओर भी इशारा किया है।

आध्यात्मिकता, प्रगतिशीलता, निरंतरता जैसी आशावादी सोच को देने वाले बंजारों की आज भी खोज जारी है-अपनी अस्मिता की, अपने अस्तित्व की, अपनी पहचान की, न्याय की, सम्मान की, संस्कृति की, आजीविका की तो कहीं ऊंचे आध्यात्मिक मूल्यों के जरिए अंर्तमन की अंतहीन यात्रा भी जारी है…..। (लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं एवं घुमंतू समुदायों के सवालों पर राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर कार्यरत है तथा सोशल अकाउंटबिलिटी फॉरम फॉर एक्शन एंड रिसर्च- सफर, नई दिल्ली के साथ जुड़े है)

कबीर ने समग्र विश्व को सीमा रहित माना है और उसमें बंजारा निर्भय होकर ज्ञान रूपी बिणज करता है-

‘‘साधो भाई बिणज करे बिणजारा।

उत्तर दखन और पूरब पश्चिम, चारों खूंट विसतारा।‘‘

गुरू नानक ने बनजारा को साधक मानकर कहा कि-

‘‘वणजु करहु वणजारि हो, वर वरू लेहु सामिलि।

तेसी वसतु विसाहीये, जैसी निबिहै नालि।‘‘

कबीर ने बंजारा को गुरु की उपमा से अलंकृत करते हुए कहा है कि-

‘‘साधो भाई सतगुरू आया बिणजारा।

आयौं औसर भूल मत भौंदू, मिले न बारम्बारा।‘‘

 

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