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Monday, December 5, 2022
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भारत को गणतंत्र क्यों कहते हैं

क्या आपको पता है कि भारत को एक गणतांत्रिक देश क्यों कहा जाता हैं? सिर्फ एक लोकतांत्रिक देश होने से कोई देश गणतंत्र नहीं बन जाता है। गणतंत्र बनने की एक बुनियादी शर्त होती है। दुनिया के तमात देशों में लोकतंत्र है, लेकिन वे देश, गणतंत्र नहीं है।

इंग्लैंड इसका प्रमुख उदाहरण है इंग्लैण्ड में लोकतंत्र, संसद एवं जनता द्वारा चुनी सरकार हैं। इंग्लैंड की तरह भारत में संसदीय व्यवस्था अपनाई गया है। इंग्लैंड का प्रधानमंत्री भी हमारे देश के प्रधानमंत्री की तरह जनता के प्रति उत्तरदायी होता है। जनता हर पांच साल में इस प्रधानमंत्री को हटाने का अधिकार रखती है। इसीलिए इंग्लैंड एक लोकतांत्रिक देश है, लेकिन इसके बावजूद भी इंग्लैंड को गणतंत्र नहीं कहा जाता है। इंग्लैंड अकेला देश नहीं है। जापान, स्पेन, बेल्जियम, डेनमार्क, चेक रिपब्लिक समेत दुनिया के तमाम ऐसे देश हैं जहां लोकतंत्र तो हैं लेकिन गणतंत्र नहीं है, लोकिन भारत लोकतंत्र के साथ-साथ एक गणतांत्रिक देश है।

दरअसल लोकतंत्र और गणतंत्र में एक बुनियादी अंतर है और वह है सत्ता के सबसे ऊंचे पद पर बैठे व्यक्ति का। अगर जनता के पास सत्ता के सबसे उंचे पद पर बैठे व्यक्ति को बदलने का अधिकार है तो उस देश को गणतांत्रिक देश कहा जाता है। अगर नहीं तो वो देश गणतांत्रिक नहीं होगा। इंग्लैंड के उदाहरण से इसे फिर से समझा जाए तो इंग्लैंड में सत्ता के सबसे उंचे पद पर राजा (या रानी) बैठा होता है। वहां आज भी नाममात्र की ही सही, लेकिन राजशाही है।

इंग्लैंड के लोग प्रधानमंत्री तो बदल सकते है लेकिन राजा नहीं। इंग्लैंड के ठीक उलट भारत में सबसे उंचे पद पर बैठा व्यक्ति राष्ट्रपति होता है, जिसे अप्रत्यक्ष रुप से जनता चुनती है। साथ ही जनता हर 5 साल में राष्ट्रपति को बदलने का अधिकार भी रखती है। इसलिए भारत एक लोकतांत्रिक देश होने के साथ-साथ गणतांत्रिक देश भी है। गणतांत्रिक देश का मुखिया राष्ट्रपति होता है। इसके अलावा लोकतंत्र और गणतंत्र में एक अंतर और है- लोकतंत्र में जनता का शासन होता है। फैसले बहुमत के आधार पर लिए जाते हैं, लेकिन कई बार यह जनता का शासन, बहुसंख्यक जनता के शासन में बदल जाता है, लेकिन गणतंत्र में कानून का शासन होता है।

एक गणतांत्रिक देश यह सुनिश्चित करता है कि अल्पसंख्यकों का हक न मारा जाए। इसलिए प्रधानमंत्री के साथ-साथ कुछ शक्तियां राष्ट्रपति को भी दी जाती है। इसीलिए भारत में राष्ट्रपति कई बार संसद के बनाए कानूनों पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर देते हैं, लेकिन लोकतांत्रिक देशों में ऐसा नहीं होता है। वहां संसद के बनाए नियम ही अंतिम होते हैं।

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