
— बाबूलाल नागा
केंद्र सरकार मनरेगा की जगह एक नया कानून लाने की तैयारी कर रही है और इससे संबंधित विधेयक लोकसभा में पेश भी किया जा चुका है। सरकार ने इस नए विधेयक का नाम रखा है— “विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)”। देश महंगाई, बेरोजगारी और असमानता के अभूतपूर्व संकट से गुजर रहा है, तब मनरेगा जैसे अधिकार आधारित कानून को बदलना केवल नीतिगत संशोधन नहीं, बल्कि गरीब मजदूरों के संवैधानिक अधिकारों पर सीधा हमला है।
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005—यानी मनरेगा—कोई साधारण सरकारी योजना नहीं है। यह ग्रामीण भारत की जीवनरेखा है। इस कानून ने पहली बार देश में “काम के अधिकार” को वैधानिक मान्यता दी। मनरेगा का मूल सिद्धांत स्पष्ट है—यदि राज्य 100 दिन का रोजगार उपलब्ध नहीं कराता, तो उसे बेरोजगारी भत्ता देना होगा। यही प्रावधान इसे अन्य कल्याणकारी योजनाओं से अलग और मजबूत बनाता है। लेकिन नया विधेयक इसी आत्मा को कमजोर करता दिखाई दे रहा है।
मनरेगा एक मांग-आधारित और सार्वभौमिक अधिकार है। कोई भी ग्रामीण वयस्क, जो अकुशल शारीरिक श्रम करने को तैयार हो, वर्ष के किसी भी समय काम मांग सकता है और राज्य उसकी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता। इसके विपरीत, नए विधेयक की धारा 5(1) कहती है कि रोजगार केवल उन्हीं ग्रामीण क्षेत्रों में मिलेगा, जिन्हें केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाएगा। यानी यदि किसी क्षेत्र को अधिसूचित नहीं किया गया, तो वहां के लोगों के लिए काम का कोई अधिकार नहीं बचेगा। इस तरह सार्वभौमिक रोजगार की गारंटी धीरे-धीरे केंद्र की कृपा पर निर्भर योजना में बदल जाएगी।
इतना ही नहीं, नया विधेयक काम की निरंतरता पर भी चोट करता है। धारा 6(2) के अनुसार राज्य सरकारें साल में 60 दिनों की ऐसी अवधि पहले से तय करेंगी, जिसमें—बुवाई और कटाई के चरम मौसम के दौरान—मनरेगा का कोई काम नहीं होगा। इसका सीधा मतलब है कि सबसे ज्यादा जरूरत के समय मजदूरों, विशेषकर महिला मजदूरों को, कानूनी रूप से काम से वंचित कर दिया जाएगा। यह प्रावधान रोजगार गारंटी के मूल विचार को ही उलट देता है।
मनरेगा से जुड़ी सबसे बड़ी व्यावहारिक समस्या रही है—मजदूरी भुगतान में देरी। कई राज्यों में मजदूरों को महीनों तक भुगतान नहीं मिलता। सुप्रीम कोर्ट तक यह मान चुका है कि भुगतान में देरी कानून का उल्लंघन है। इसके बावजूद नए विधेयक में समयबद्ध भुगतान को और मजबूत करने के बजाय जवाबदेही को धुंधला किया जा रहा है। जब पेट भूखा हो, तब “तकनीकी सुधार” की भाषा गरीब के घावों पर नमक छिड़कने जैसी है।
मनरेगा ने महिलाओं, दलितों, आदिवासियों और भूमिहीन मजदूरों को सबसे अधिक संबल दिया है। आज मनरेगा के कुल श्रमिकों में आधे से अधिक महिलाएं हैं। यह केवल रोजगार नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और सामाजिक सुरक्षा का माध्यम रहा है। गांवों में मनरेगा एक पहचान बन चुका है। करोड़ों मजदूर इसी नाम से अपने अधिकार को जानते हैं। ऐसे में नाम बदलने से जमीनी स्तर पर भ्रम, जानकारी की कमी और क्रियान्वयन में गंभीर बाधाएं खड़ी होंगी।
एक और गंभीर चिंता यह है कि नया विधेयक केंद्र के हाथों में अधिक नियंत्रण सौंपता है, जबकि मनरेगा की ताकत उसकी विकेंद्रीकृत संरचना रही है। ग्राम सभा तय करती है कि गांव को क्या चाहिए—तालाब, सड़क, जल संरक्षण या खेतों की मेड़। यदि फैसले ऊपर से थोपे जाएंगे, तो मनरेगा स्थानीय जरूरतों की बजाय कागजी लक्ष्यों का कार्यक्रम बनकर रह जाएगा।
यह भी नहीं भूलना चाहिए कि संकट के समय मनरेगा ने देश को संभाला है। कोरोना महामारी के दौरान जब लाखों मजदूर शहरों से गांव लौटे, तब मनरेगा ही उनका आखिरी सहारा बना। उस समय काम और मजदूरी बढ़ाने की जरूरत थी, लेकिन बजट सीमित रखा गया। नया विधेयक उसी सोच की अगली कड़ी प्रतीत होता है—कम खर्च, कम जिम्मेदारी और ज्यादा नियंत्रण।
सामाजिक संगठनों का मानना है कि यह विधेयक संविधान की भावना के खिलाफ है। अनुच्छेद 21 केवल जीवित रहने का नहीं, बल्कि गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है। काम छीनना, मजदूरी देर से देना और हक मांगने वालों को “तकनीकी कारणों” से बाहर कर देना—क्या यही गरिमापूर्ण जीवन है?
मनरेगा को अक्सर “खैरात” कहकर बदनाम किया जाता है, जबकि सच्चाई यह है कि इस योजना से गांवों में स्थायी परिसंपत्तियां बनी हैं—जल संरक्षण, मिट्टी सुधार, हरियाली और ग्रामीण बुनियादी ढांचा। अर्थशास्त्री मानते हैं कि मनरेगा जैसे कार्यक्रम ग्रामीण मांग को बढ़ाते हैं और पूरी अर्थव्यवस्था को नीचे से मजबूत करते हैं। ऐसे में इसे बोझ बताना आर्थिक दृष्टि से भी आत्मघाती है।
नए विधेयक के खिलाफ उठ रहा विरोध केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक संघर्ष है। यह सवाल पूछ रहा है कि सरकार किसके साथ खड़ी है—कॉरपोरेट मुनाफे के साथ या गरीब मजदूर के पसीने के साथ? अगर विकास का अर्थ मजदूर को और असुरक्षित करना है, तो ऐसे विकास पर सवाल उठना जरूरी है।
आज जरूरत इस बात की है कि मनरेगा को कमजोर नहीं, बल्कि और मजबूत किया जाए—मजदूरी दरें महंगाई के अनुसार बढ़ें, काम मांगते ही मिले, बेरोजगारी भत्ता सुनिश्चित हो और भुगतान समय पर हो। नाम बदलने की नहीं, बल्कि मनरेगा की आत्मा—रोजगार, गरिमा और अधिकार—को बचाने की जरूरत है।
अंततः यह लड़ाई केवल एक कानून की नहीं, बल्कि उस सोच की है जो गरीब को बोझ समझती है। मनरेगा को कमजोर करना मतलब ग्रामीण भारत की रीढ़ तोड़ना। अगर सरकार सचमुच “सबका विकास” चाहती है, तो उसे यह विधेयक वापस लेकर मजदूरों, पंचायतों और सामाजिक संगठनों से संवाद करना होगा। वरना इतिहास गवाह रहेगा कि जिस कानून ने करोड़ों लोगों को जीने का सहारा दिया, उसी को नीतियों ने दम तोड़ने पर मजबूर कर दिया। (लेखक भारत अपडेट’ के संपादक हैं)
