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Sunday, March 3, 2024
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विकल्प की दिशा में एक प्रकाश स्तंभ

 

-मेधा पाटकर

मधु लिमये यह नाम भारत के संसदीय इतिहास में ही नहीं, समाजवादी इतिहास में भी शिल्पबद्ध हो चुका है। उनके जीवन भर के कार्य और आजादी आंदोलन के दौरान तथा आजाद भारत के पहले पर्व में उनका वैचारिक योगदान मात्र एक शोध कार्य का नहीं, आगे की दिशा और मार्ग का भी आधार हो सकता है। आज देश की राजनीति और उसके अनैतिक चाल-चलन को देखते-जानते हुए एक निःस्वार्थ, स्पष्टवक्ता, जनवादी जन-प्रतिनिधि के नाते मधु लिमये का कार्यकाल ही हमारे मन में परिवर्तन की आशा जीवित रख सकता है।

भारत की राजनीति को सामाजिक समता और न्याय के मूल्यों से जोड़ना समाजवादियों की अभिलाषा रही है। उसी का प्रतिबिंब मधु लिमये जैसे समाजवादी राजनीति में लगे रहे कार्यकर्ता के निर्णय में सदा झलकता रहा है। कांग्रेस से अलगाव खड़ा होते वक्त लोहिया जी के साथ ‘समाजवादी’ पक्ष (पार्टी) की स्थापना करने में, समाजवादियों को चुनाव में उतारकर अनपेक्षित सफलता पाने में, संसद में हर राजनीतिक दल पर, हिम्मत से और प्रभावी व्यक्तित्व में अपना कर्तव्य झलकाने से, अंकुश रखने वाले मधु लिमये की यही मंजिल थी। उन्होंने दलितों-शोषितों के लिए दर्द लेकर आजीवन राजनीति की। युवावस्था में मधु जी के लिए एसएम जोशी जैसे समाजवादी का जीवन दर्शन और गांधीजी के आर्थिक-सामाजिक दर्शन का प्रभाव ही प्रेरणा स्रोत था। वे मानते थे कि आंबेडकरवादी सोच और जाति-वर्णव्यवस्था पूर्ण रूप से नकारने का संदेश महत्त्वपूर्ण था जबकि गांधीजी का एकता की ओर चलने का मार्ग भिन्न था। राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण से नजदीकी से जुड़े रहे।

मधु जी स्वतंत्रत विचार और स्पष्ट अभिव्यक्तियों के कारण ही मतभिन्नता के बावजूद अपना रिश्ता, किसी भी प्रकार के समझौते के बिना कायम रखे हुए थे। लोहिया जी और जयप्रकाश जी के मतभेद हों या इंदिरा गांधी जी का संसद में उजागर होकर उन्हें सजा दिलाने वाले…, प्रकरणों में हस्तक्षेप हो, मधु जी की भूमिका प्रखर लेकिन हर नेता के गुणदर्शी कार्य को मानने और सराहने वाली रहती थी। उनकी यही विशेषता समाजवादियों के सत्यवादी विश्लेषण का आधार रही और उन्होंने अपने जीवन के अंतिम किंतु दीर्घ कालखंड में सक्रिय राजनीति से विदाई लेने के बाद किए विराट ग्रंथ लेखन के द्वारा सामने लाया जो आज तक हम सभी सामाजिक परिवर्तन की आस लेकर चलते रहे, कार्यकर्ताओं के लिए उपलब्ध है।

मधु जी चुनाव में जाते तो भी न केवल खुद के चुनाव क्षेत्र में बल्कि हर संघर्ष क्षेत्र में जनप्रतिनिधि बन जाते थे। अन्य अनेक युवाओं के साथ 1938 के अंत में समाजवादी पार्टी के पूर्णकालीन कार्यकर्ता बनकर खानदेश के धुलिया जिले में युद्ध विरोधी वक्तव्य के लिए सश्रम कारावास की सजा भुगतते वक्त मधु लिमये जी ने साने गुरुजी के साथ आत्मीय रिश्ता होने के बाद 21 भाषण किये थे और उससे प्रभावित होकर साने गुरुजी ने बहुत सारे नोट्स लिखे थे, जो कि ‘दुर्दैव’ से 1942 के संघर्ष में गायब हो गए तो उसकी पुस्तिका नहीं बन पाई। आजादी के आंदोलन के दौरान आकाशवाणी की स्थापना से 2 साल तक जेल भुगतने में मधु जी शामिल रहे। जेल में कार्यकर्ताओं के बारे में उनसे जानकारी लेने के लिए उन पर काफी अत्याचार किए गए लेकिन वे अडिग रहे। श्रमिकों के लिए कार्य एसएम जोशी जैसे समाजवादी नेताओं ने स्वीकार किया। मधु लिमये जी ने इन मेहनतकशों के साथ काम करने में कोई संकोच नहीं किया। चावल के व्यापारियों ने भ्रष्टाचार उजागर करने से हुए लाभ में से एक हजार रुपए का चंदा मधु जी को भेज दिया, तो हम क्या व्यापारियों के दलाल हैं? यह सवाल करते हुए उन्होंने चंदे की राशि सधन्यवाद लौटा दी।

स्वतंत्रता पाने के बाद भी मधु जी की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक सभी मोर्चों पर समाजवादी दृष्टि से गैरबराबरी के खिलाफ लड़ने में अगुवाई रही। ‘अनुशासन पर्व’ में जिनका विरोध किया उन इंदिरा गांधी ने विदेश नीति के बारे में मधु जी की सलाह लेना कभी टालना नहीं चाहा। सांसद के रूप में विरोधी दलों की सच्ची भूमिका अदा करना, उसी के तहत सत्ताधारियों का सामना करते हुए मधु जी का संकल्प रहा। संसद के बाहर भी वे हर जन संघर्ष में शामिल होते रहे, किंतु साथ-साथ राजनीति में परिवर्तन लाने के लिए मधु जी ने चुनावी प्रक्रिया पर कई बार सवाल किए और वैकल्पिक प्रक्रिया, संरचना प्रभावी होने के लिए अनेकानेक सुझाव भी दिए।

जनतांत्रिक समाजवाद की स्पष्टता, रूपरेखा और प्रक्रिया स्वयं के लेखन कार्य और वक्त से प्रचारित करने का ‘धुरा’ जीवन भर संभालने वाले मधु जी का योगदान देश की आज की परिस्थिति में विचार-धन है। वह जाति-अंधता, धर्मान्धता के कट्टर विरोधी रहे। मधु जी, गांधी-लोहिया-जयप्रकाश के साथ जोड़ कर, समाजवादी विकल्प की दिशा में संकल्पकृत रहने के लिए प्रकाश स्तंभ बने रहे।

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