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Tuesday, December 6, 2022
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समुदाय की सहभागिता के बिना योजनाएं सफल नहीं

हमारे देश में बहुत सारी योजनाएं चलाई जा रही हैं। केंद्र से लेकर राज्य और ब्लॉक स्तर से लेकर पंचायत स्तर तक अनेकों योजनाएं हैं। इन सभी योजनाओं का अंतिम लक्ष्य समुदाय को लाभ पहुंचाना है। उनके जीवन स्तर को ऊंचा उठाना और क्षेत्र का विकास करना है। कुछ योजनाओं से जनता को सीधा लाभ मिलता है तो कुछ योजनाएं क्षेत्र के विकास के लिए चलाईं होती हैं।

अच्छी बात यह है कि सरकार की इन योजनाओं को सफल बनाने में कई स्वयंसेवी संस्थाएं भी काम करती हैं। लेकिन अफसोस की बात यह है कि इन योजनाओं की समाप्ति के बाद इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं होता है। अक्सर योजनाओं की अवधि खत्म होने के बाद न तो सरकारी विभाग को इससे कोई सरोकार होता है और न ही स्वयंसेवी संस्थाएं इस दिशा में कोई प्रयास करती हैं। विशेषकर क्षेत्र के विकास के लिए शुरू की गई परियोजनाओं का तो और भी बुरा हाल होता है।

उत्तराखण्ड राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में सरकार की कोई भी योजनाएं ग्रामवासियों के लिए आजीविका व सुविधा की दृष्टि से वरदान साबित होती हैं, परंतु परियोजना समाप्ति के पश्चात् वही योजनाएं रखरखाव न होने के कारण ग्रामीणों के लिए अभिशाप सिद्ध हो रही है। वर्ष 2010-2011 में राज्य के 670 गांवों को अटल आदर्श ग्राम घोषित कर उन्हें सोलर लाइटों से जगमगाया गया था। लेकिन महज कुछ वर्षों के अंतराल के बाद जो मार्ग रोशनी से जगमगा रहे थे, वह आज अंधेरे में डूब गउ हैं।

वर्तमान में उत्तराखंड के घर-घर में बिजली तो पहुंच गई है, परंतु इन घरों तक ले जाने वाले मार्ग काले घने अंधेरे में डूबे हुए हैं। जो सोलर लाइट खराब हो जाती है वह फिर सुचारु नहीं हो पाती हैं या इन्हें फिर से रोशन करने के लिए बड़ी मशक्कत करनी पड़ती है।

नैनीताल शहर में बैंक हाउस मालरोड के पास स्ट्रीट लाइट विगत 6 वर्षों से खराब थी, कई बार शिकायत दर्ज कराने के उपरान्त दुबारा रोशन हुई, परंतु मात्र एक माह के भीतर फिर खराब हो गई। जब शहरों में यह हाल है तो गांवों की स्थिति कैसी होगी, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।

अल्मोड़ा जनपद के लमगड़ा विकासखण्ड स्थित कल्टानी गांव के गोविंद सिंह फत्र्याल कहते है उनके गांव में वर्ष 2015-16 में उत्तराखण्ड अक्षय ऊर्जा विकास एजेंसी (उरेड़ा) द्वारा 20 सोलर लाइटें लगाईं गईं थीं, जिन्होंने कुछ समय तक सुनसान अंधेरे रास्तों को दीयों की तरह रोशन कर दिया था। परंतु वर्तमान में 09 लाइट खराब हो चुकी हैं। जिसे ठीक करने के लिए किसी विभाग द्वारा कोई कार्यवाही नहीं की गई। बार-बार अनुरोध किये जाने पर एक बार सही किया गया। जो पुनः खराब हो गया।

इस संबंध में उन्होंने सुझाव दिया कि इस प्रकार के कार्यों को करने के बाद इनकी देखभाल के लिए प्रत्येक छह माह में तकनीकि जांच करवायी जानी चाहिए। परियोजना समाप्ति के बाद भी इनके उचित संचालन की योजनाएं बनाने की आवश्यकता है।

इस संबंध में सिरसोड़ा गांव के एक सामाजिक कार्यकर्ता खीम सिंह बिष्ट कहते हैं कि पूर्व के समय में ग्रामवासी शाम 06.30 बजे के बाद अपने घरों से बाहर कम निकला करते थे। अंधेरे में जंगली जानवरों का भय व आक्रमण ने उनके मन में डर पैदा कर दिया था। लेकिन उनके ग्राम में उरेड़ा अन्तर्गत सोलर लाइटें लगीं, जिससे गांव वालों का रात में भी आवागमन संभव हो पाया। उन्होंने बताया कि जब भी यह लाइटें खराब होती हैं तो संबंधित विभाग को शिकायत दर्ज कराई जाती है। कई बार अधिकारी फोन पर ही लाइट ठीक करने की प्रक्रिया समझाते हैं। जो ग्रामवासियों के लिए एक चुनौती बन जाती है क्योंकि ग्रामवासी तकनीकि ज्ञान से अनभिज्ञ होते है।

खीम सिंह सुझाव देते हैं कि सरकार को चाहिए कि ग्राम स्तर पर योजनाओं के निर्माण के साथ ही ग्रामीणों को प्रशिक्षण भी दे ताकि परियोजनाओं की समाप्ति के बाद वह उसका तकनीकि रूप से रख रखाव सक्षम हो सकें।

राज्य की राजधानी देहरादून में उरेड़ा के साथ काम करने वाले नरेंद्र मोहन इस बात से सहमत हैं कि किसी भी योजना के सफल कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए उचित रखरखाव की आवश्यकता होती है। अगर हम सोलर लाइट के रखरखाव की बात करते हैं, तो मेरा मानना है कि इन लाइटों पर सब्सिडी देने की पिछली व्यवस्था पर फिर से विचार किया जाना चाहिए। व्यक्तियों द्वारा समान निवेश इन रोशनी को बनाए रखने के लिए ग्रामीणों पर समान जिम्मेदारी डालते हैं।

नरेंद्र मोहन ने कहा कि सरकार को उन्हें खुद ही इन लाइटों की मरम्मत करने में सक्षम बनाने के लिए उचित प्रशिक्षण और तकनीकी ज्ञान प्रदान करना चाहिए। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि स्व-सहायता समूहों को गांव में इस तरह की परियोजनाओं की देखभाल करने की जिम्मेदारी दी जा सकती है क्योंकि ये समूह पहाड़ी क्षेत्रों में काफी सक्रिय हैं।
परियोजना समाप्ति के बाद योजनाओं की दुर्गति की एक और बानगी उत्तराखंड में पौधा रोपण के रूप में देखने को मिलती है।

पर्वतीय क्षेत्रों में ग्रामों की रीढ़ की हड्डी कहलाने वाली वन पंचायत जिनमें प्रति वर्ष हजारों की संख्या में विभिन्न प्रजातियों के पौधों का रोपण किया जाता है, जो परियोजना के दौरान कागजों में शत प्रतिशत सफल भी होते हैं। परंतु योजना की समाप्ति के तीन माह के भीतर रखरखाव के अभाव के कारण केवल 55 प्रतिशत पौधे ही जीवित रह पाते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में वन पंचायत एक खुला चारागाह है जिस पर जानवरों द्वारा नुकसान पहुंचाया जाना स्वाभाविक है।

योजनाओं का जाल इस तरह फैल रहा है कि अधिकांश ग्रामों में 02-03 परियोजनाएं एक समय में समान कार्य कर रही हैं। प्रत्येक परियोजनाओं का उद्देश्य अधिक से अधिक पेड़ लगाना होता है। इस कारण वन पंचायतों में मात्र 2 मीटर की दूरी पर 2 से 3 ओक के पेड़ (बांज या शाहबलूत एक पेड़ है, जिसका अंग्रेजी नाम ओक है) देखने को मिल रहे हैं। यह दूरी इन पौधों के लिए इतनी कम है जो इन नवीन पौधों का अस्तित्व निश्चित रूप से समाप्त कर देगी।

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि पौध से पेड़ का सपना पूर्ण करना है तो रोपण में तकनीकि मानकों का ध्यान रखना आवश्यक है। जल संरक्षण हेतु विभिन्न परियोजनाओं में खाल खन्तियों का निर्माण किया जाता है जिनका सकारात्मक प्रभाव प्राकृतिक जल स्रोतों, नालों व गधेरों में जल वृद्धि के रूप में देखने को मिल रहा है। परंतु आज भी पूर्व निर्मित खाल खन्तियों की जीर्ण शीर्ण हालत को देखकर दुख होता है। नवीन निर्माण से अच्छा तो होगा कि पूर्व की खाल खन्तियों का रखरखाव कर उन्हें नवीन किया जाए।

इस संबंध में नैनीताल जनपद के घारी विकासखण्ड स्थित जलना नीलपहाड़ी गांव के पिताम्बर मेलकानी कहते हैं कि उनकी वन पंचायत में डी.एस.टी परियोजना अन्तर्गत वर्ष 2018-2020 के मध्य खाल खन्तियों का निर्माण सेन्ट्रल हिमालयन इन्वायरमेन्ट एसोसियेशन (चिया) संस्था नैनीताल के माध्यम से करवाया गया जिससे ग्रामवासियों को ग्राम स्तर पर कार्य मिलने से आजीविका संवर्धन के साथ साथ प्राकृतिक जल स्रोतों में जल स्तर में वृद्धि देखने को मिली। वर्तमान में 55 परिवार इन संरचनाओं के कारण अपनी पानी की आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम हैं। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि आने वाले वर्षों में इन संरचनाओं के रखरखाव के लिए कौन जिम्मेदार होगा?”

यह सिर्फ उत्तराखंड की बात नहीं है बल्कि कई अन्य पहाड़ी राज्यों को भी अपनी कठिन भौगोलिक स्वरूपों के कारन ऐसी ही समस्याओं का सामना करना पड़ता है। सभी मौसमों में विशेषकर अत्यधिक बर्फबारी के दिनों में, जबकि इन क्षेत्रों का पूरे देश से संपर्क कट जाता है, ऐसी मुश्किल घड़ी में इस प्रकार की परियोजनाओं को बनाये रखना सबसे बड़ा चैलेंज है। इसलिए इन परियोजनाओं में स्थानीय लोगों को सहभागिता और उनकी क्षमताओं का निर्माण करने तथा उन्हें इस तरह की पहल में सामान रूप से शामिल करना काफी महत्वपूर्ण होगा। यानी समुदायों की सहभागिता के बिना किसी योजना की सफलता अधूरी है। जिसकी तरफ सरकार को ध्यान देने की आवश्यकता है।

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