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Sunday, September 20, 2026
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दुनिया में ऐसी कोई समस्या नहीं होती जिसका भौतिक समाधान मौजूद न हो: डॉ. कार्ल मार्क्स

-सरदूल सिंह

5 मई 1818 को जर्मनी के त्रियेर शहर में जन्मे डॉ. कार्ल मार्क्स एक ऐसे महान दार्शनिक सिद्ध हुए जिनके विचारों ने न केवल दर्शनशास्त्र की दिशा बदली बल्कि पूरी दुनिया के सामाजिक-राजनीतिक इतिहास को प्रभावित किया। उनके दार्शनिक विचारों को ही ‘मार्क्सवाद’ कहा जाता है जो आज भी साहित्य, समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र के आलोचनात्मक अध्ययन का सबसे सटीक वैज्ञानिक पैमाना माना जाता है। मार्क्स का यह प्रसिद्ध कथन आज भी हर मानवीय गतिविधि का मार्गदर्शन करता है: “दार्शनिकों ने अब तक विभिन्न तरीकों से दुनिया की व्याख्या की है, लेकिन मुख्य कार्य इसे बदलना है।”

कार्ल मार्क्स के पिता एक वकील थे और वे चाहते थे कि उनका पुत्र भी कानून की पढ़ाई करे। इसी उद्देश्य से उनका दाखिला बॉन विश्वविद्यालय में कराया गया, लेकिन शीघ्र ही मार्क्स की जिज्ञासु बुद्धि वहां असंतुष्ट हो गई। उन्होंने अपने पिता को पत्र लिखकर बर्लिन विश्वविद्यालय जाने का आग्रह किया, क्योंकि उन्हें लगा कि उनके जीवन और समाज से जुड़े मौलिक प्रश्नों के उत्तर केवल दर्शनशास्त्र के गहन अध्ययन में ही मिल सकते हैं। उन्होंने कहा था कि हर व्यक्ति को युवावस्था में ही दर्शन का अध्ययन कर लेना चाहिए ताकि वह जीवन के प्रति एक तार्किक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित कर सके।

जब वे बर्लिन विश्वविद्यालय में दाखिल हुए, तो वहां महान दार्शनिक हेगेल के विचारों का प्रभुत्व था। मार्क्स भी प्रारंभ में ‘यंग हेगेलियंस’ संगठन के सदस्य बने, लेकिन उनकी विलक्षण बुद्धि ने जल्द ही हेगेल के दर्शन की सीमाओं को पहचान लिया। हेगेल का दर्शन  ‘अध्यात्मवाद- द्वंद्ववादी’ पर आधारित था, जिसमें विचारों के निरंतर द्वंद्व (वाद, प्रतिवाद और संवाद) को विकास का आधार माना गया था। मार्क्स ने इसे चुनौती दी और सिद्ध किया कि विचार, पदार्थ (Matter) से उत्पन्न होते हैं, न कि पदार्थ विचारों से।

दर्शन में क्रांति: भौतिकवाद- द्वंद्ववादी: मार्क्स ने अपनी पीएचडी ‘एपिक्युरस के दर्शन’ पर पूर्ण की। उन्होंने हेगेल से ‘द्वंद्ववादी पद्धति’ ली और लुडविग फायरबाख से ‘भौतिकवाद’ ग्रहण किया। इन दोनों के समन्वय से उन्होंने  ‘भौतिकवाद – द्वंद्ववादी’  (Materialism-Dialectical) की नींव रखी। उन्होंने तर्क दिया कि हेगेल का दर्शन सिर के बल खड़ा था, जिसे उन्होंने पैरों के बल खड़ा कर दिया। उनके अनुसार, पदार्थ प्राथमिक है और विचार द्वितीयक; पदार्थ ही विचारों को जन्म देता है और फिर वही विचार द्वंद्वात्मक रूप में भौतिक जगत को प्रभावित करते हैं। इसी आधार पर उन्होंने स्पष्ट किया कि “आज तक का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास है।”

अर्थशास्त्र में नई दिशा: मूल्य का श्रम सिद्धांत: मार्क्स की दूसरी बड़ी क्रांति अर्थशास्त्र के क्षेत्र में थी। उनसे पहले मूल्य सृजन में श्रम की वास्तविक भूमिका को वह वैज्ञानिक महत्व नहीं दिया जाता था। मार्क्स ने सिद्ध किया कि केवल ‘मानव श्रम शक्ति’ ही एकमात्र ऐसा “परिवर्तनशील” संसाधन है, जो अपने स्वयं के मूल्य से अधिक मूल्य पैदा करने की क्षमता रखती है। कच्चा माल, मशीनें और भूमि जैसे तत्व अपरिवर्तनशील हैं। यहीं से ‘अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत’ (Theory of Surplus Value) सामने आया। यह सिद्धांत वैज्ञानिक रूप से सिद्ध करता है कि कैसे पूंजीपति मजदूर के श्रम को हड़प कर अपनी पूंजी का ढ़ेर  बड़ा करता है, जबकि उत्पादक श्रम शक्ति शोषण के कारण गरीब होती जाती है। इस खोज ने पूरे आर्थिक चिंतन की धारा को ही बदल दिया और शोषण की गणना का एक ठोस आधार प्रदान किया।

वैज्ञानिक साम्यवाद और भविष्य का समाज: मार्क्स ने ‘वैज्ञानिक साम्यवाद’ की अवधारणा प्रस्तुत की। उनसे पहले के विचारकों ने साम्यवादी समाज की केवल आदर्शवादी कल्पना की थी, लेकिन मार्क्स ने इसे भौतिक और आर्थिक आधारों पर सिद्ध किया। उन्होंने कहा कि पूंजीवाद अपने विकास के चरम पर पहुंचकर स्वयं के विनाश के बीज बोता है। उन्होंने एक ऐसे वर्ग विहीन और शोषणमुक्त समाज की गणना की, जहाँ तकनीक इतनी उन्नत होगी कि उत्पादन प्रचुर मात्रा में होगा।

मार्क्स के अनुसार, साम्यवादी समाज में मनुष्य काम अपनी मजबूरी या भूख मिटाने के लिए नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक आवश्यकता और आनंद के रूप में करेगा। मजदूरी की गुलामी का अंत होगा और प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व के सांस्कृतिक विकास के लिए पर्याप्त ‘मुक्त समय’ (Free Time) प्राप्त होगा। वहां वेतन के लिए काम करने की बाध्यता नहीं होगी, बल्कि “प्रत्येक से उसकी क्षमता अनुसार और प्रत्येक को उसकी आवश्यकता अनुसार” का नियम लागू होगा।

वर्तमान समय और मार्क्सवाद की जरूरत: आज जब वैश्विक स्तर पर पूंजीवाद के संकट गहरे हो रहे हैं और आर्थिक असमानता बढ़ रही है, तब मार्क्स के विचार और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। उन्होंने चेताया था कि पूंजीवाद लाभ के लिए देशों को युद्ध की आग में धकेलता है। उनके बहुत  में प्रमुख ग्रंथ ‘दास कैपिटल’, ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’, ‘दर्शन की दरिद्रता’ और ‘उजरती श्रम तथा पूंजी’  तथा बहुत सारे कथन,लेख और पत्र आज भी मानवता के लिए मशाल की तरह हैं।

मार्क्स के क्रांतिकारी सूत्र जैसे—” परोलेटेरिएट के पास खोने के लिए कुछ नहीं है, पाने के लिए सारी दुनिया है”—आज भी दुनिया भर के काम से बाहर निकाले गए तथा रोजगार की प्रतीक्षा में बैठे युवाओं  को एकजुट होने की प्रेरणा देते हैं। मार्क्स ने केवल एक दर्शन नहीं दिया, बल्कि दुनिया को बदलने का एक अजेय वैज्ञानिक  आत्मिक हथियार दिया है। डॉ. कार्ल मार्क्स दुनिया के वे महान दार्शनिक थे जिन्होंने इस दुनिया का वैज्ञानिक अध्ययन किया और मानवता को अंधेरे से बाहर निकलने का मार्ग प्रशस्त किया। आज उनकी जयंती पर उनको सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि उनके पदार्थवादी वैज्ञानिक दर्शन का अध्ययन करते हुए आत्मसात कर उसका आत्मिक रूप में उपयोग कर, समाज को विकसित, समतावादी स्तर की ओर ले जाने के प्रयास में अपना योगदान दें।

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