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Sunday, March 3, 2024
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भारत को एक समता और न्याय मूलक समाज चाहिए

     -वेदव्यास
दलित कौन है और कहां से आया है तथा इसे किसने बनाया है जैसी बहस को बौद्धिक खिलाड़ियों के लिए छोड़ते हुए मैं वर्तमान भारत में दलित को एक पीड़ित, शोषित, वंचित और धर्म और जाति के नाम पर अभिशप्त मानता हूं जो हजारों साल से सूर्य पुत्र महर्षि मनु द्वारा प्रतिपादित ‘मनु स्मृति‘ की वर्ण व्यवस्थाओं का सताया हुआ है। यह दुनिया का एक ऐसा अस्पृश्य अध्याय है जिसे हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर आचार्य शंकर से लेकर आज तक भारत में सींचा और संजोया जा रहा है। वेदों ने जिसे गाया है और सवर्णों ने जिसे परवान चढ़ाया है। ऐसे हिंदू धर्म की दुखती रग को पहली बार 20वीं शताब्दी में भारत में भारत के स्वाधीनता संग्राम से डॉ. भीमराव अंबेडकर ने ही आजादी के बाद संविधान की प्रस्तावना का आधार तत्व बनाया है। वह- ‘हम भारत के नागरिक‘ ही आज के दलित हैं जिन्हें महात्मा गांधी हरिजन कहते थे तो सवर्ण समाज शूद्र मानते थे। इन्हीं दलितों की कथा-व्यथा को लेकर पिछले दिनों राजस्थान विश्वविद्यालय के समाज विज्ञान शोध केंद्र द्वारा प्रो. बी. एम. शर्मा, प्रो. एस. एल., वर्मा तथा डॉ. राममूर्ति मीणा के गंभीर प्रयासों से दलित, भारत एवं वैश्वीकरण विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी के रूप में प्रस्तुत किया गया और अभूतपूर्व जिज्ञासु विद्धानों ने एक स्वर से यह माना कि जाति और धर्म के नाम पर जब तक यह दलित वर्ग है तब तक भारतीय लोकतंत्र का प्रत्येक सपना अप्रासांगिक है।
डॉ. भीमराव अंबेडकर ने बहुत सच कहा था कि भारत के दलित ही उपनिवेशकाल के गिरमिटिया मजदूर हैं और साम्राज्यवाद समय के अश्वेत नीग्रो है तो स्वतंत्र भारत के ऐसे अनुसूचित नागरिक हैं जो कहीं मजदूरी के नाम पर तो, कहीं नस्लभेद के नाम पर तो कहीं जाति-वर्ण के नाम पर सामाजिक परिवर्तन के लिए एक समतावादी सभ्य समाज बनाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। हमारी संपूर्ण भक्तिकाल की परंपरा में समाज सुधारक संत कवि कभी कबीर बनकर तो कभी नानक बनकर तो कभी तुकाराम और ज्योतिबा फुले बनकर इस मानवतावादी चेतना को आगे बढ़ा रहे हैं।
वेदों के सूत्रधार वेदव्यास, रामायण के सृष्टा वाल्मीकि, ऋषि पाराशर, भारद्वाज, नारद, विदुर, रैदास-रविदास सरीखे सैकड़ों निर्गुण दलित भी शताब्दियों से महर्षि मनु की इस महाभारत से जूझ रहे हैं। आज हम इस मनुष्यता की खोज में इतना आगे बढ़ गए हैं कि चारों तरफ दलित भारत में सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक परिवर्तन के जयघोष सुनाई पड़ रहे हैं। यह हमारे लोकतंत्र में एक व्यक्ति राजनीतिक एक वोट के अधिकार का ऐसा चमत्कार है कि अंधेरे की सभी दीवारें एक के बाद एक ढह रही है। हम भारत के दलित लगातार इसीलिए कह रहे हैं कि अमेरिका में परिवर्तन की जिस आधारशिला को लिंकन और मार्टीन लूथर किंग ने रखा था। हमें उसी परंपरा को,  अंबेडकर के सपनों को आगे बढ़ाना होगा। क्योंकि परिवर्तन लाने के लिए समाज में सैकडों हजारों साल संघर्ष करना पड़ता है। इस दिशा में अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका और भारत जैसे उपनिवेशी राष्ट्र एक उदाहरण बन सकते हैं।
हमें विश्वास रखना चाहिए कि भारत में दलित को एक मनुष्य का गौरव और अधिकार दिलाने का यह न्याययुद्ध केवल 75 साल से जारी है तथा डॉ. भीमराव अंबेडकर प्रणीत ‘भारत का संविधान‘ एक ऐसा धर्म ग्रंथ है जिसने भारत के करोड़ों अनुसूचित जाति के दलितों को परिवर्तन का वेदमंत्र सिखा दिया है और हजारों साल की हिंदुवादी जातीय मानसिकताएं अपनी हारी हुई अंतिम लड़ाई लड़ रही हैं। परिवर्तन की इस आंधी में राजनीतिक और नागरिक समानता का एक किला तो ध्वस्त हो गया है। लेकिन शेष तीन सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक मोर्चों पर यह भीषण संघर्ष भारत की घर-चौपाल, खेल-खलिहान तथा ग्रामसभा से लेकर लोकसभा तक जारी है। यह संघर्ष और संवाद इतना रोचक है कि सूर्य पुत्र मनु पर समय पुत्र अंबेडकर भारी पड़ रहे हैं तथा जो कल तक दलितों को शुद्र कह रहे थे, वही आज एक दलित के. आर. नारायणन को भारत का राष्ट्रपति, के. जी. बालकृष्णन को सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश तो कांशीराम की मानस पुत्री मायावती को मुख्यमंत्री बना रहे हैं। हमें इस बात को भी समझना होगा कि लोकतंत्र में धर्म और जाति के आधार पर राष्ट्रवादी राजनीति करने वाले दल भी आज राष्ट्रपति के रूप में एक आदिवासी महिला द्रौपदी मुर्मू को आगे बढ़ाने को विवश है।  आश्चर्य तो यह है कि दलितों को ‘हम भारत के नागरिक‘ बनाने का यह मुक्ति संग्राम छत्तीस जातियां मिलकर चला रही है और गा रही है कि -‘हम होंगे कामयाब एक दिन/मन में है पूरा विश्वास, पूरा है    विश्वास /हम होंगे कामयाब एक दिन‘।
हमें गर्व है कि डॉ. भीमराव अंबेडकर की संविधान संरचना को भारत भी हजारों जातियों की सवर्ण संविधान सभा में स्वीकृति दी थी और विश्वास दोहराया था कि यह भारत दलितों का भी है। अतः जाति एक चुनौती है और धर्म एक विडम्बना है। हमें इससे घबराना नहीं चाहिए क्योंकि तथाकथित हिंदू धर्म में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि शूद्र और दलित एक सनातन धर्म नहीं है। दरअसल, धर्म की संकीर्णता और कट्टरता की सामाजिक-आर्थिक एवं सांस्कृतिक राजनीति करने वाले ही आज लोकतंत्र में दलितों को जाति के नाम पर विभाजित और प्रताड़ित कर रहे हैं। इस अर्थ में हिंदुत्व के नाम पर केवल ब्राह्मण का वर्चस्व स्थापित करना ही एक धर्म विरोधी मानसिकता है। यह प्रभुसत्ता और श्रेष्ठता का दंभ ही पूंजीवादी, साम्राज्यवादी तथा उपनिवेशवादी सामंतशाही का षड्यंत्र है जो मनु और मनुष्य में भेद-विभेद फैला रहा है और द्वैत-अद्वैत की राग अलाप रहा है। यह वर्तमान सांस्कृतिक राष्ट्रवाद इसी हिंदुत्ववाद का मुखौटा है जो लोकतंत्र में मानवाधिकारों का शत्रु है।
हमारी आज सबसे बड़ी आवश्यकता तो यह है कि दलितों को शिक्षित संगठित और संघर्ष कर्मी बनाया जाए। दलितों में अन्तरजातीय विवाहों को बढ़ाया जाए। आरक्षण के दरवाजे से सत्ता और व्यवस्था के स्वर्ग में आए दलितों को नव ब्राह्मण बनने से रोका जाए तथा दीनता दिखाने और पलायन करने की मानसिकता से दलितों को मुक्त कराया जाए। आज 21वीं शताब्दी में और भू-मंडलीकरण की मुक्त बाजार व्यवस्था में दलित का पहला  दुश्मन तो उसका खुद का अज्ञान और जाति-धर्म का भय है। यह भय और पाखंड ही दलितों का गरुड़ पुराण है तथा हजारों साल से शिक्षित, संपन्न और संगिठत सवर्ण जातीय वर्ग ही इसका लाभ उठा रहा है। आजादी के बाद आए संवैधानिक लोकतंत्र में दलित एक ऐसे शुतुरमुर्ग की तरह जातीय एवं धर्म व्यवस्थाओं से पीड़ित है जो शिक्षा भूमि तथा शक्ति संचयन के प्रश्नों से कोई मुठभेड़ नहीं करना चाहता।
भारत में कई राज्य आज जिस नक्सलवाद तथा उग्रवाद से पीड़ित हैं यह संपूर्ण सामाजिक-आर्थिक समानता का संघर्ष है तथा संविधान की भावना को साकार करने का ही परिवर्तन कार्यक्रम है। अतः जो भ्रष्ट सामाजिक-आर्थिक राज्य व्यवस्था दलित, आदिवासी, घूमंतु जातियां और अनुसूचित जातियां अब तक न्याय के समान अवसरों से वंचित हैं, वह सब लड़ रही हैं। यहां आरक्षण एक परिवर्तन की पगडंडी तो है लेकिन कोई राजपथ नहीं है। यह पूंजीवाद द्वारा प्रायोजित ऑस्कर पुरस्कार में झोंपड़पट्टी के कुत्तों और अरबपतियों के बीच की खूनी प्रतियोगिता है। राजस्थान की तरह उत्तर भारत के राज्यों में दलित उत्पीड़न इसीलिए सातवें आसमान पर है कि यह गऊ भूमि है, हिंदुत्व धर्मी हैं तथा साधु से भी जाति-गौत्र पूछती है। राममनोहर लोहिया कहते थे कि जिंदा कौम पांच साल का इंतजार नहीं करती,  लेकिन सच यही है कि दलित जातियां हजारों साल से भी अपना मुक्ति संग्राम और परिवर्तन की कोई रणनीति नहीं पा रही है। इस संदर्भ में प्रो. एस. एल. वर्मा लिखित पुस्तक-हिंदुत्व का वैश्वीकरण (प्रकाशक-नेशनल पब्लिशिंग हाउस, जयपुर) को यदि आप पढ़ेंगे तो आपको पता चलेगा कि हिंदुत्व का चेहरा, चाल और चरित्र कितना बर्बर है और दलित बंदी इसमें अमेरिकी ‘ग्वेन्तानामो बे‘ शिविर की तरह-अंधविश्वास, अशिक्षा, पाखंड और विकृतियों का कैसे शिकार है। अतः दलितों को भी अपने गिरहबान में झांकना चाहिए। वस्तुतः दलितों का यह उदयकाल है और स्वामी विवेकानंद के अनुसार 21वीं शताब्दी भारत में परिवर्तन की शताब्दी है तथा धर्म तथा जाति के अखाड़े अब इस भूमंडलीकरण की आंधी में उखड़ जाएंगे, क्योंकि धर्म और जाति की व्यवस्था अप्राकृतिक है और लोकतंत्र विरोधी है। (लेखक साहित्यकार एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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