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Wednesday, September 23, 2026
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महिलाओं के मोबाइल पर बैन: जब चौपाल संविधान से ऊपर बैठ जाए

-बाबूलाल नागा

राजस्थान के जालोर जिले के जसवंतपुरा क्षेत्र के गाजीपुरा गांव में आयोजित एक सामाजिक पंचायत के पंच-पटेलों ने महिलाओं और बेटियों के लिए कैमरा युक्त मोबाइल फोन के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया।  महिलाएं मोबाइल फोन को सार्वजनिक समारोहों के साथ-साथ पड़ोसियों के घर जाने के दौरान भी नहीं ले जा सकेंगी। यह पाबंदी किसी एक गांव तक सीमित नहीं है, बल्कि 14 पट्टियों (उप-मंडलों) के अंतर्गत आने वाले 15 गांवों पर इसे लागू करने की तैयारी है। आगामी गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) से समुदाय की सभी महिलाओं और बेटियों को इन नियमों का पालन करना अनिवार्य होगा।

जालोर से आई ये खबर सिर्फ एक गांव की सामाजिक सनक नहीं है, बल्कि यह उस खतरनाक मानसिकता का खुला प्रदर्शन है जो आज भी भारत के संविधान से ऊपर खुद को समझती है। जाति पंचायत द्वारा महिलाओं के मोबाइल फोन इस्तेमाल पर रोक लगाने का फरमान दरअसल तकनीक के खिलाफ नहीं, महिलाओं की आजादी, उनकी चेतना और उनके आत्मनिर्णय के अधिकार के खिलाफ एक सुनियोजित हमला है। यह फैसला हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम 21वीं सदी के भारत में रह रहे हैं या फिर समाज का एक हिस्सा अब भी मनुवादी अंधकार में कैद है।

मोबाइल फोन आज सिर्फ बातचीत का साधन नहीं रह गया है। यह शिक्षा का दरवाजा है, रोजगार की संभावना है, सरकारी योजनाओं तक पहुंच का माध्यम है और सबसे बढ़कर महिलाओं के लिए सुरक्षा और आत्मनिर्भरता का औजार है। ऐसे में जब किसी पंचायत द्वारा महिलाओं के हाथ से मोबाइल छीनने का आदेश दिया जाता है, तो वह केवल एक उपकरण पर पाबंदी नहीं लगाती, बल्कि महिलाओं की आवाज, उनकी स्वतंत्र सोच और उनके नागरिक अधिकारों पर ताला लगाने की कोशिश करती है। यह वही सोच है जो सदियों से महिलाओं को घूंघट, चूल्हा-चौका और खामोशी तक सीमित रखना चाहती रही है।

इस फरमान के पीछे दिया गया तर्क भी उतना ही खोखला और पाखंडी है-कि मोबाइल से “संस्कृति बिगड़ती है” और “परंपरा खतरे में पड़ती है”। सवाल यह है कि क्या संस्कृति इतनी कमजोर होती है कि एक मोबाइल फोन से ढह जाए? या फिर सच्चाई यह है कि पुरुष वर्चस्व और जातिगत नियंत्रण की दीवारें दरकने लगी हैं, और उसी डर में ऐसे फैसले सुनाए जा रहे हैं। संस्कृति के नाम पर महिलाओं की आजादी पर पहरा बैठाना दरअसल संस्कृति नहीं, सत्ता का संरक्षण है।

यह मामला केवल सामाजिक नैतिकता तक सीमित नहीं है, यह सीधे-सीधे संवैधानिक संकट है। भारत का संविधान महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार देता है। समानता, स्वतंत्रता और गरिमा का अधिकार किसी पंचायत की दया पर निर्भर नहीं है। जाति पंचायत का यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 की खुली अवहेलना है। यह फैसला यह सवाल उठाता है कि क्या देश में कानून का राज है या फिर गांव की चौपालें समानांतर अदालत बन चुकी हैं।

सबसे विडंबनापूर्ण तथ्य यह है कि ऐसे हर फरमान में “महिलाओं की इज्जत” का तर्क आगे किया जाता है। लेकिन इज्जत का ठेका हमेशा महिलाओं के सिर पर ही क्यों? पुरुषों के मोबाइल, उनके सोशल मीडिया, उनकी आजादी पर कोई सवाल नहीं उठता। यानी नैतिकता सिर्फ महिलाओं के लिए और छूट पुरुषों के लिए। यही दोहरा चरित्र भारतीय समाज की सबसे गहरी बीमारी है, जिसे पंचायतें और तथाकथित सामाजिक ठेकेदार पीढ़ी दर पीढ़ी पालते आए हैं।

जालोर की यह घटना कोई अपवाद नहीं है। इससे पहले भी देश के कई हिस्सों में खाप और जाति पंचायतें प्रेम विवाह, अंतरजातीय रिश्तों, महिलाओं के कपड़ों, आवाजाही और शिक्षा पर फरमान जारी करती रही हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अब नियंत्रण का नया हथियार मोबाइल बन गया है। वजह साफ है-क्योंकि मोबाइल सवाल पूछना सिखाता है, जानकारी देता है और डर की दीवारें तोड़ता है। और यही बात पितृसत्तात्मक सत्ता को सबसे ज्यादा खलती है।

इस पूरे प्रकरण में प्रशासन और सरकार की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। अगर यही फैसला किसी शहरी इलाके में होता, तो शायद तत्काल कार्रवाई होती। लेकिन ग्रामीण महिलाओं के अधिकारों को अक्सर “सामाजिक मामला” कहकर टाल दिया जाता है। यह चुप्पी सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि इस अन्याय में मौन सहमति जैसी है। राज्य सरकार, महिला आयोग और कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी यहीं आकर कठघरे में खड़ी होती है।

विडंबना यह भी है कि एक तरफ सरकारें “डिजिटल इंडिया”, “बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ” और महिला सशक्तिकरण के बड़े-बड़े नारे लगाती हैं, वहीं दूसरी तरफ जमीनी स्तर पर महिलाओं से डिजिटल साधन ही छीन लिए जाते हैं। क्या यही सशक्तिकरण है? क्या यही विकसित भारत का सपना है, जहां एक महिला को मोबाइल रखने के लिए पंचायत से अनुमति लेनी पड़े?

अगर समाज को सच में सुधारना है, तो पाबंदी मोबाइल पर नहीं, बल्कि बाल विवाह, दहेज, घरेलू हिंसा, नशे और बेरोजगारी पर लगनी चाहिए। लेकिन इन मुद्दों पर पंचायतों की जुबान खामोश रहती है, क्योंकि वहां सवाल सत्ता और पुरुष वर्चस्व का होता है। महिलाओं पर नियंत्रण आसान है, इसलिए निशाना वही बनती हैं।

यह लड़ाई सिर्फ जालोर की महिलाओं की नहीं है। यह लड़ाई उस भारत की आत्मा की है, जो संविधान से चलने का दावा करता है। आज मोबाइल छीना गया है, कल शिक्षा, रोजगार और निर्णय का अधिकार भी छीना जा सकता है। अगर समाज और राज्य ने समय रहते ऐसे फरमानों का विरोध नहीं किया, तो यह चुप्पी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक खतरनाक विरासत छोड़ जाएगी।

जालोर की जाति पंचायत का फैसला एक चेतावनी है-अगर लोकतंत्र सोया रहा, तो जातिगत तानाशाही जागती रहेगी। अब वक्त है कि पंचायतों को याद दिलाया जाए-भारत जाति पंचायत से नहीं, संविधान से चलता है। महिलाओं के हाथ से मोबाइल छीनकर समाज को सुरक्षित नहीं बनाया जा सकता। सुरक्षा और सम्मान उस दिन आएगा, जिस दिन महिलाओं को बराबरी का नागरिक समझा जाएगा, न कि नियंत्रण की वस्तु। मोबाइल पर बैन लगाकर नैतिकता नहीं बचाई जा सकती। नैतिकता तब बचेगी, जब सोच बदलेगी। (लेखक भारत अपडेट के संपादक हैं)

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